चित्तौड़ का किला – इतिहास, निर्माण, साके, विजय स्तम्भ और प्रमुख तथ्य | Chittorgarh Fort History in Hindi

Table of Contents

चित्तौड़ का किला (Chittorgarh Fort)

चित्तौड़ किले के उपनाम

  • राजस्थान का गौरव
  • चित्रकूटगढ़ / चित्रकोट
  • राजस्थान का दक्षिण-पूर्वी प्रवेश द्वार
  • दुर्गाधिराज
  • राजस्थान के किलों का सिरमोर
  • “गढ़ तो गढ़ चित्तौड़गढ़, बाकी सब गढ़या।” (प्रसिद्ध उक्ति)
  • मालवा का प्रवेश द्वार
  • हिन्दू देवी-देवताओं का अजायबघर
  • वीरों का तीर्थ

निर्माण

  • निर्माता: चित्रांग मौर्य
    • स्रोत: वीर विनोद, कुमारपाल प्रबन्ध, मुहणौत नैणसी
  • मेवाड़ के इतिहास ग्रंथ वीर विनोद के अनुसार:
    मौर्य राजा चित्रांग (चित्रांगद) ने यह किला बनवाकर अपने नाम पर “चित्रकोट” रखा, जो बाद में “चित्तौड़” कहलाया।
  • चित्रांगद मौर्य – मौर्य वंश के राजा बृहद्रथ का पुत्र था।
  • 15वीं शताब्दी में महाराणा कुंभा ने इसका पुनर्निर्माण करवाया।
  • निर्माण काल: 7वीं शताब्दी
  • स्थान: मेसा के पठार पर (ऊँचाई 609 मीटर)
  • स्रोत: UNESCO Nomination Dossier for Hill Forts of Rajasthan

आकार व क्षेत्रफल

  • लम्बाई: 8 किमी
  • चौड़ाई: 2 किमी
  • कुल क्षेत्रफल: 305 हेक्टेयर
  • आकार: व्हेल मछली के समान
  • राजस्थान का सबसे बड़ा किला
  • राजस्थान का सबसे बड़ा लिविंग फोर्ट
  • किले के अंदर खेती भी होती है
  • यह गम्भीरी व बेड़च नदियों के संगम के पास बना है।
  • दक्षिणी हिस्से में मृगवन स्थित है।
  • दिल्ली से मालवा व गुजरात जाने वाले मार्ग पर होने से इसका सामरिक महत्व रहा।

किले का इतिहास

  • 734 ई. में बप्पा रावल (कालमोज) ने मौर्य वंश के अंतिम शासक मानमोरी को हराकर चित्तौड़ पर अधिकार किया। (राजप्रशस्ति के अनुसार)
  • दशरथ शर्मा के अनुसार:
    चित्तौड़ दुर्ग का प्रथम विजेता रावल जैत्रसिंह था।
  • पहला हमला – रावल खुमाण के समय, अफगानिस्तान के मामु द्वारा (8वीं सदी)।
  • 9वीं शताब्दी: यह दुर्ग प्रतिहारों के अधीन था।
  • बाद में परमार राजा मुंज (मालवा का शासक) ने इसे गुहिलों से छीन लिया
  • 10वीं–11वीं शताब्दी: परमारों का अधिकार रहा।
  • 1133 ई. – गुजरात के सोलंकी राजा जयसिंह (सिद्धराज) ने यशोवर्मन को हराकर अधिकार किया।
  • 1174 ई. – मेवाड़ के राजा सामन्त सिंह ने अजयपाल को हराकर दुर्ग को पुनः गुहिलों के अधीन कर लिया।

ऐतिहासिक महत्व

  • राजस्थान का दुर्गाधिराज — सबसे विशाल और संरक्षित किला।
  • गढ़ तो गढ़ चित्तौड़गढ़, बाकी सब गढ़या” इस उक्ति से इसकी वीरता झलकती है।
  • यह दुर्ग UNESCO World Heritage Site में शामिल है (Hill Forts of Rajasthan)।

चित्तौड़ किला का इतिहास (Chittorgarh Fort History in Hindi)

चित्तौड़ किले का साम्राज्यिक विकास

  • नागदा के इल्तुतमिश द्वारा विनाश के बाद रावल जैत्रसिंह ने चित्तौड़ को पहली बार राजधानी बनाया।
  • 1303 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर अधिकार किया और इसका नाम “खिजाबाद” रखा।
  • 1326 ई. में राणा हम्मीर ने चित्तौड़ पर पुनः अधिकार किया और गुहिल वंश की सिसोदिया शाखा का शासन प्रारम्भ हुआ।
  • मार्च 1535 ई. में चित्तौड़ के दूसरे साके के बाद यह बहादुर शाह (गुजरात) के अधिकार में चला गया।
  • मार्च 1536 ई. में मेवाड़ी सरदारों की सहायता से महाराणा विक्रमादित्य ने पुनः अधिकार प्राप्त किया।
  • 1536 से 1540 ई. के बीच यह किला दासीपुत्र बनवीर के अधिकार में रहा।
  • 1540 ई. में महाराणा उदयसिंह ने बनवीर से चित्तौड़ पुनः प्राप्त किया।
  • 1544 ई. में शेरशाह सूरी के आक्रमण के समय उदयसिंह ने किले की चाबियाँ शेरशाह सूरी को सौंप दीं।
  • 1567–68 ई. में तीसरे साके के बाद चित्तौड़ अकबर के अधिकार में चला गया।
  • 1615 ई. में मुगल-मेवाड़ संधि के तहत जहाँगीर ने यह किला महाराणा अमरसिंह प्रथम को सौंप दिया।

महाराणा कुम्भा और चित्तौड़ का पुनर्निर्माण

  • महाराणा कुम्भा ने चित्तौड़ दुर्ग का जीर्णोद्धार (1433–1468 ई.) करवाया।
  • उन्होंने रथ मार्ग, सातों प्रवेश द्वार, विजय स्तम्भ, कुंभ श्याम मंदिर, कुंभा महल और श्रृंगार चंवरी का निर्माण करवाया।
  • इसलिए चित्तौड़गढ़ दुर्ग का आधुनिक निर्माता महाराणा कुम्भा को माना जाता है।

चित्तौड़ किले के सात मुख्य प्रवेश द्वार (Gates of Chittorgarh Fort)

  1. पाडनपोल – चित्तौड़ किले का पहला प्रवेश द्वार।
    • यहीं बाघ सिंह रावत का स्मारक बना है।
  2. भैरव पोलदेसूरी के भैरोंदास सोलंकी के नाम पर, जो 1535 के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए।
  3. हनुमानपोल – इसके और भैरव पोल के बीच जयमल राठौड़कल्ला राठौड़ की छतरियाँ स्थित हैं।
  4. गणेश पोल – किले के मध्य भाग की ओर जाने वाला मार्ग।
  5. जोडनपोल (जोड़ला पोल) – किले के आंतरिक क्षेत्र में प्रवेश हेतु।
  6. लक्ष्मण पोल – पश्चिम दिशा में स्थित।
  7. रामपोल – यह चित्तौड़ किले का मुख्य प्रवेश द्वार है।
    • इसके सामने पत्ता सिसोदिया का स्मारक स्थित है।
    • पत्ता 1568 ई. में अकबर के विरुद्ध युद्ध में हाथी की सूंड से उठाकर पटक दिए जाने से वीरगति को प्राप्त हुए।

सूरजपोल – यह किले का पूर्वी द्वार है।
त्रिपोलिया दरवाजा – किले के आंतरिक भाग में स्थित है।

चित्तौड़ का गौरव

  • चित्तौड़ को “वीरों का तीर्थ” कहा जाता है।
  • इस दुर्ग ने रानी पद्मिनी, रानी कर्णावती, जयमल-कल्ला, और पत्ता सिसोदिया जैसे वीरों की अमर गाथाएँ देखी हैं।
  • आज यह UNESCO World Heritage Site के रूप में विश्व प्रसिद्ध है।
स्रोत:
  • वीर विनोद, मुहणौत नैणसी री ख्यात, राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति – कक्षा 10 (राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड)
  • UNESCO Nomination Dossier for Hill Forts of Rajasthan

चित्तौड़ दुर्ग के प्रमुख जल स्रोत

चित्तौड़ दुर्ग के प्रमुख जल स्रोत

1. कुकडेश्वर का कुण्ड व मंदिर

  • यह कुण्ड और मंदिर महाभारतकालीन माने जाते हैं।
  • किवदन्तियों के अनुसार इनका संबंध पांडव पुत्र भीम से है।

2. रत्नेश्वर तालाब

  • यह तालाब महाराणा रतनसिंह द्वारा बनवाया गया था।

3. भीमलत कुण्ड

  • किवदन्तियों के अनुसार यह पांडव भीम द्वारा निर्मित है।

4. चित्रांग मोरी तालाब

  • इस तालाब का निर्माण चित्रांगद मौर्य ने करवाया था।

5. गोमुख कुण्ड

  • यह पवित्र कुण्ड समीधेश्वर मंदिर के पास स्थित है।

6. पद्मिनी तालाब

  • पद्मिनी महल के समीप स्थित यह तालाब अत्यंत सुंदर और ऐतिहासिक है।

चित्तौड़ किले के प्रमुख महल

1. कुंभा महल

  • निर्माता: महाराणा कुंभा (1433–1468 ई.)
  • यहीं स्थित कंवरपदा में महाराणा सांगा के पुत्र उदयसिंह का जन्म हुआ।
  • यहीं पन्नाधाय ने उदयसिंह की रक्षा हेतु अपने पुत्र चंदन का बलिदान दिया।
  • कंवरपदा के महल सांगा ने मीरा बाई के लिए बनवाए थे, जो कुंभा महल का ही भाग हैं।

2. रानी पद्मिनी महल

  • यह चित्तौड़ दुर्ग का सबसे आकर्षक स्थल है।
  • यह पद्मिनी तालाब के उत्तरी तट पर बना है।
  • तालाब के मध्य एक तीन मंजिला जलमहल स्थित है।

3. रतनसिंह पैलेस

  • निर्माता: महाराणा रतनसिंह द्वितीय
  • पास ही रत्नेश्वर तालाब और रत्नेश्वर महादेव मंदिर स्थित हैं।

4. फतह प्रकाश महल

  • निर्माता: महाराणा फतेहसिंह
  • यह किले का नवीनतम भवन है।
  • वर्तमान में इसमें राजकीय संग्रहालय (Government Museum) संचालित है।

5. गोरा-बादल महल

  • स्थान: पद्मिनी महल के दक्षिण-पूर्व में
  • इसमें दो गुम्बदाकार इमारतें हैं।

6. नौ कोठा मकान / नवलखाँ भंडार

  • निर्माता: बनवीर
  • यह अधूरा बना लघु दुर्ग है, जो कुंभा महल के सामने स्थित है।
  • इसे “बनवीर की दीवार” भी कहा जाता है।

7. हिंगलू अहाड़ा के महल

  • हिंगलू, डूँगरपुर का अहाड़ा सरदार, इन महलों में रहता था।

8. जयमल हवेली

  • निर्माण काल: महाराणा उदयसिंह का शासनकाल।

9. भामाशाह हवेली

  • दुर्ग के तोपखाने के पास स्थित है।
  • वर्तमान में यह जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है।

10. आल्हा काबरा की हवेली

  • चित्तौड़ किले के भीतर स्थित ऐतिहासिक हवेली।

11. राव रणमल की हवेली

  • यह भी चित्तौड़गढ़ दुर्ग के अंदर स्थित प्रमुख हवेलियों में से एक है।

12. लाखोटा बारी

  • रत्नेश्वर कुंड से कुछ दूरी पर, पहाड़ी के पूर्वी किनारे पर स्थित एक छोटा दरवाज़ा।
  • कहा जाता है कि इसी स्थान के पास अकबर की गोली से जयमल घायल (लंगड़ा) हुआ था।
  • यह द्वार किले के नीचे उतरने का मार्ग प्रदान करता है।
स्रोत:
  • वीर विनोद, मुहणौत नैणसी री ख्यात, राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति – कक्षा 10 (राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड)

चित्तौड़ दुर्ग के प्रमुख मंदिर (Temples of Chittorgarh Fort)

चित्तौड़गढ़ दुर्ग न केवल वीरता का प्रतीक है बल्कि यह धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यहाँ के मंदिर स्थापत्य कला, शिल्प और संस्कृति का अद्भुत उदाहरण हैं।

चित्तौड़ दुर्ग के प्रमुख मंदिर

1. कालिका माता मंदिर

  • यह मूलतः सूर्य मंदिर था।
  • निर्माण: 7वीं सदी के अंत में राजा मानभंग द्वारा।
  • स्थापत्य शैली: प्रतिहारकालीन शैली
  • स्रोत: सुजस, पेज नं. 805
  • वर्तमान में यह कालिका माता को समर्पित है।

2. तुलजा भवानी मंदिर

  • निर्माणकर्ता: बनवीर
  • इस मंदिर का निर्माण बनवीर ने अपने तुलादान के धन से करवाया था।

3. समीधेश्वर मंदिर / त्रिभुवन नारायण मंदिर / मोकल जी का मंदिर

  • स्थान: गोमुख कुंड के किनारे
  • स्थापत्य शैली: नागर शैली
  • मूल निर्माता: परमार राजा भोज (1011–1055 ई.)
  • पुनर्निर्माण: महाराणा मोकल (1428 ई.)
  • विशेषता:
    • इसमें शिव की त्रिमुखी मूर्ति स्थापित है।
    • मंदिर में 1150 ई. का कुमारपाल शिलालेख भी लगा है।

4. कुंभ श्याम मंदिर

  • स्थापत्य: प्रतिहारकालीन शैली
  • मूलतः शिव मंदिर, जिसे बाद में वैष्णव मंदिर में परिवर्तित किया गया।
  • इसे मलेच्छों द्वारा नष्ट किए जाने के बाद महाराणा कुंभा ने 1449 ई. में इसका जीर्णोद्धार करवाया।
  • इसमें विष्णु के वराह अवतार की मूर्ति स्थापित है।
  • मूल निर्माता का कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं मिलता।

5. मीराबाई मंदिर

  • स्थान: कुंभश्याम मंदिर परिसर
  • निर्माणकर्ता: महाराणा सांगा
  • उद्देश्य: अपनी पुत्रवधू मीराबाई की भक्ति के लिए।
  • मंदिर के सामने रैदास जी की चार स्तम्भों वाली छतरी बनी हुई है।

6. श्रृंगार चंवरी

  • मूलतः शांतिनाथ का जैन मंदिर
  • निर्माणकर्ता: कुंभा के कोषाध्यक्ष (भंडारी) बेलका
  • विशेषता:
    • इसी मंदिर में कुंभा की पुत्री रमाबाई के विवाह की चंवरी (मंडप) बनी है।

7. सतबीस देवरी

  • निर्माण काल: 11वीं सदी
  • यह एक भव्य जैन मंदिर है।
  • इसमें 27 छोटी-छोटी देवरियाँ हैं, जिनमें जैन धर्म के तीर्थंकरों की मूर्तियाँ स्थापित हैं।

8. नीलकंठ महादेव मंदिर

  • किवदन्ती के अनुसार:
    • पांडव भीम महादेव की इस मूर्ति को अपने बाजुओं में बाँधकर रखते थे।

9. बाण माता मंदिर

  • यह गुहिल वंश की कुल देवी का मंदिर है।

10. अन्नपूर्णा (बिरवड़ी माता का मंदिर)

  • निर्माणकर्ता: महाराणा हम्मीर

11. रत्नेश्वर महादेव मंदिर

  • यह मंदिर रतनसिंह पैलेस के बाहर स्थित है।

12. सोमदेव मंदिर

  • यह भी चित्तौड़गढ़ किले के भीतर स्थित एक प्राचीन मंदिर है।

स्रोत:
राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति, कक्षा-10 (राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, अजमेर), पृष्ठ-70

विजय स्तम्भ – चित्तौड़गढ़ का गौरव (Vijay Stambh, Chittorgarh)

निर्माण का इतिहास

  • विजय स्तम्भ का निर्माण महाराणा कुम्भा ने मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी प्रथम पर सारंगपुर विजय (1437 ई.) के उपलक्ष्य में करवाया था।
  • निर्माण कार्य 1440 ई. में प्रारम्भ होकर 1448 ई. में पूर्ण हुआ।
  • निर्माण पर उस समय लगभग 30 लाख रुपये का व्यय हुआ था।
  • यह स्तम्भ 122 फीट ऊँचा और 9 मंजिला है, जिसमें 157 सीढ़ियाँ हैं।

स्थापत्य व विशेषताएँ

  • प्रमुख शिल्पी: जैता एवं उसके पुत्र नापा, पोमा और पूंजा
  • पुराविद् आर. सी. अग्रवाल ने प्रकाशित सूची में जैता के अन्य पुत्रों – भूमि, चुथी और बलराज – का भी उल्लेख किया है।
  • शिल्पी जैता और उसके पुत्रों की आकृतियाँ दूसरी और पाँचवीं मंजिल में उकेरी गई हैं।
    (स्रोत – सुजस, पेज नं. 800)

स्थापत्य विवरण

  • यह स्तम्भ प्रतिहारकालीन नागर शैली में निर्मित है।
  • 9वीं मंजिल पर पहले बिजली गिरने से क्षति पहुँची थी, जिसे बाद में महाराणा स्वरूपसिंह ने पुनः बनवाया।
  • इसकी दीवारों पर पौराणिक कथाएँ, देवी-देवताओं की मूर्तियाँ और शिल्प कला के उत्कृष्ट उदाहरण देखे जा सकते हैं।
  • यह स्तम्भ वास्तव में राजस्थान की मूर्तिकला और स्थापत्य का विश्व प्रसिद्ध नमूना है।

कीर्ति स्तम्भ का उल्लेख

  • इसकी तीसरी मंजिल पर अरबी भाषा में 9 बार “अल्लाह-अल्लाह” लिखा गया है।
  • कीर्ति स्तम्भ परिपाटी (3 दिसंबर 1460 ई.)
    • रचयिता: कवि अत्रि और उनके पुत्र महेश
    • स्थान: विजय स्तम्भ की सबसे ऊपरी मंजिल
    • वर्तमान में इस लेख की केवल दो शिलाएँ शेष हैं।

धार्मिक व सांस्कृतिक महत्व

  • विष्णु को समर्पित होने के कारण डॉ. उपेन्द्रनाथ ने इसे “विष्णुध्वज” कहा है।
  • गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने इसे “पौराणिक देवताओं का अमूल्य कोष” बताया।
  • डॉ. गोट्ज़ ने इसे “भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोष” कहा।
  • गोपीनाथ शर्मा ने इसे “लोकजीवन का रंगमंच” बताया।
  • फर्ग्यूसन ने इसकी तुलना “रोम के टार्जन” से की।
  • कर्नल जेम्स टॉड ने कहा – “दिल्ली की कुतुब मीनार भले ही ऊँची हो,
    पर विजय स्तम्भ की कारीगरी सबसे बढ़कर है।”

अतिरिक्त तथ्य

  • विजय स्तम्भ राजस्थान की पहली इमारत है जिस पर 15 अगस्त 1949 को 1 रुपये का डाक टिकट जारी किया गया था।
  • यह स्तम्भ राजस्थान पुलिस और राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, अजमेर के प्रतीक चिह्न में भी अंकित है।
  • यह केवल स्थापत्य का प्रतीक नहीं, बल्कि वीरता, संस्कृति और धर्म का संगम भी है।
  • इसलिए इसे “हिन्दू देवी-देवताओं का म्यूज़ियम” कहा जाता है।
स्रोत
  • सुजस (पेज नं. 800)
  • राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति, कक्षा-10 (राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, अजमेर)

चित्तौड़ किले का गौरवशाली इतिहास

हम्मीर की प्रशस्ति में उल्लेख

  • कक्षा 10 की पुस्तक “राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति” (पृष्ठ 9) के अनुसार प्रशस्ति में हम्मीर को “विषम घाटी पंचानन” कहा गया है।
  • लेकिन यह गलत है —
    डॉ. गोपीनाथ शर्मा की पुस्तक “राजस्थान के इतिहास के स्रोत” (पृष्ठ 49) के अनुसार,
    कुम्भलगढ़ के शिलालेख की चौथी शिला में हम्मीर को “विषमघाटी पंचानन” कहा गया है।

जैन कीर्ति स्तम्भ

  • स्थान: चित्तौड़ दुर्ग
  • यह स्तम्भ आदिनाथ / ऋषभदेव को समर्पित है।
  • पुरातत्व विभाग के अनुसार इसका निर्माण जैन व्यापारी बघेरवाल जीजा एवं उसके पुत्र पुण्यसिंह द्वारा 1301 ई. में करवाया गया।
  • ऊँचाई: 75 फीट, मंज़िलें: 6
  • समीप ही एक ऊँचे चबूतरे पर 14वीं शताब्दी का जैन मंदिर स्थित है।
  • स्थापत्य शैली में यह चित्तौड़ की जैन कला का सर्वोत्तम उदाहरण है।

चित्तौड़ के तीन प्रसिद्ध साके (Three Sakas of Chittorgarh)

चित्तौड़ के तीन प्रसिद्ध साके

राजपूत इतिहास में “साका” शब्द का अर्थ है —
जब वीर पुरुष युद्ध में मृत्यु का वरण करते हैं और स्त्रियाँ अग्नि में आत्मोत्सर्ग करती हैं।
चित्तौड़गढ़ में तीन बार साका हुआ, जिनकी वीरगाथाएँ आज भी अमर हैं।

चित्तौड़ का प्रथम साका – 1303 ई.

  • आक्रमणकारी: अलाउद्दीन खिलजी
  • चित्तौड़ के शासक: रावल रतनसिंह
  • तिथि: 26 अगस्त 1303 ई.
  • कारण: अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण और पद्मिनी को प्राप्त करने की अभिलाषा।
  • जौहर का नेतृत्त्व: रानी पद्मिनी व अन्य रानियाँ
  • सेनापति: गोरा और बादल (चाचा–भतीजा) जिन्होंने वीरगति प्राप्त की।
  • विजय के बाद किला अलाउद्दीन खिलजी ने अपने पुत्र खिज्र खाँ को सौंपा और नाम रखा “खिजाबाद”।
  • उल्लेख: तारीख-ए-अलाई (अमीर खुसरो)
  • कुछ समय बाद किला जालौर के कान्हड़दे चौहान के भाई मालदेव मुंछाला को दिया गया।
  • 1326 ई. में सिसोदा के हम्मीर ने सोनगरा चौहानों से यह किला पुनः छीन लिया।

चित्तौड़ का दूसरा साका – 1535 ई.

  • आक्रमणकारी: गुजरात शासक बहादुरशाह (सेनापति – रूमी खाँ)
  • चित्तौड़ के शासक: महाराणा विक्रमादित्य
  • आक्रमण से पूर्व विक्रमादित्य और उदयसिंह को ननिहाल बूंदी भेज दिया गया था।
  • तिथि: 8 मार्च 1535 ई.
  • जौहर का नेतृत्त्व: रानी कर्मावतीजवाहर बाई (विक्रमादित्य की रानी)।
  • रानी कर्मावती ने हुमायूँ को राखी भेजी, परंतु सहायता नहीं मिली।
  • मेवाड़ी सेना का नेतृत्व: रावत बाघसिंह (प्रतापगढ़) — जिन्होंने युद्ध में वीरगति प्राप्त की।
  • उल्लेख: वीर विनोद (श्यामलदास)

चित्तौड़ का तीसरा साका – 1568 ई.

  • आक्रमणकारी: अकबर (मुगल शासक)
  • चित्तौड़ के शासक: महाराणा उदयसिंह
  • उदयसिंह ने किले का भार जयमल राठौड़ को सौंप दिया और स्वयं गोगुन्दा की पहाड़ियों में चले गए।
  • युद्ध: अकबर की सेना बनाम जयमल राठौड़ व पत्ता सिसोदिया (सेनापति)
  • तिथि: 25 फरवरी 1568 ई.
  • जयमल व पत्ता दोनों ने वीरगति प्राप्त की।
  • जौहर का नेतृत्त्व: रानी फूलकंवर (पत्ता की पत्नी)
  • इस युद्ध के बाद चित्तौड़ पर मुगलों का अधिकार स्थापित हुआ।
स्रोत
  • राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति (कक्षा-10, राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, अजमेर)
  • गोपीनाथ शर्मा – राजस्थान के इतिहास के स्रोत
  • वीर विनोद (श्यामलदास)
  • तारीख-ए-अलाई (अमीर खुसरो)

चित्तौड़ दुर्ग का वीरता और बलिदान का इतिहास

जयमल और कल्ला राठौड़ का अदम्य पराक्रम

  • चित्तौड़ के तीसरे साके (1568 ई.) में जब अकबर ने दुर्ग पर आक्रमण किया, तब जयमल राठौड़ और पत्ता सिसोदिया ने सेनानायक के रूप में दुर्ग की रक्षा की।
  • कल्ला जी राठौड़ दूल्हे के भेष में युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
  • युद्ध के बाद अकबर ने “कत्ल-ए-आम” का आदेश दिया, जिसमें लगभग 30,000 लोग मारे गए।
  • किले के भीतर जयमल राठौड़ व कल्ला राठौड़ की छतरियाँ बनी हुई हैं।
  • अंतिम द्वार (रामपोल) के सामने पत्ता सिसोदिया का स्मारक स्थित है।

इस युद्ध का वर्णन अकबरनामा (अबुल फज़ल) में मिलता है।
युद्ध के उपरांत अकबर ने चित्तौड़ का प्रभार आसफ खाँ को सौंपा और स्वयं अजमेर चला गया।

चित्तौड़ी बुर्ज और मोहर मगरी

  • दुर्ग का अंतिम दक्षिणी बुर्ज चित्तौड़ी बुर्ज कहलाता है।
  • इसके नीचे एक कृत्रिम पहाड़ी है जिसे मोहर मगरी कहा जाता है।
  • कहा जाता है कि अकबर ने 1567 ई. के आक्रमण के समय,
    प्रत्येक मजदूर को एक तगारी मिट्टी के बदले एक मोहर देकर यह टीला बनवाया था ताकि उस पर तोपें रखकर किले पर हमला किया जा सके।

यात्रियों और इतिहासकारों के कथन

  • हयून केसन ने लिखा — “चित्तौड़ के सुनसान, परित्यक्त किले में विचरण करते समय मुझे ऐसा लगता है,
    मानो मैं किसी भीमकाय जहाज की छत पर चल रहा हूँ।”
  • इतिहासकार यदुनाथ सरकार ने कहा — “मेवाड़ में यदि किसी ने हल्दीघाटी और चित्तौड़गढ़ को देख लिया तो समझ लो उसने सब कुछ देख लिया,
    और यदि इन्हें नहीं देखा तो सब कुछ देखने पर भी उसने कुछ नहीं देखा।”

जौहर स्थल

  • किले के भीतर स्थित जौहर स्थल अब मिट्टी से भर दिया गया है।
  • यह वही स्थान है जहाँ से रानी पद्मिनी, रानी कर्मावती और रानी फूलकंवर जैसी वीरांगनाओं ने अग्नि में प्रवेश किया था।

आधुनिक मान्यता और उपलब्धियाँ

  • 21 जून 2013 को चित्तौड़गढ़ दुर्ग को यूनेस्को विश्व विरासत स्थल (UNESCO World Heritage Site) घोषित किया गया।
  • 2018 ई. में इस दुर्ग पर ₹12 मूल्य का डाक टिकट जारी किया गया।

फोर्ट फेस्टिवल (Fort Festival, Chittorgarh)

  • पहला फोर्ट फेस्टिवल: फरवरी 2019 में आयोजित हुआ।
  • दूसरा फोर्ट फेस्टिवल: 3 से 5 जनवरी 2020 तक मनाया गया।

जौहर मेला

  • यह मेला चैत्र कृष्ण एकादशी को चित्तौड़गढ़ दुर्ग में आयोजित होता है।
  • यह वीरता और बलिदान की स्मृति में मनाया जाने वाला ऐतिहासिक आयोजन है।

विशेष ऐतिहासिक लेख और शिलालेख

  • चित्तौड़ लेख (971 ई.)
    • यह शिलालेख चित्तौड़ से प्राप्त हुआ है, किंतु वर्तमान में अहमदाबाद में संरक्षित है।
    • इसमें तत्कालीन शासक नरवर्मा द्वारा महावीर जिनालय (जैन मंदिर) के निर्माण का उल्लेख है।
    • इस प्रशस्ति में उल्लेख है कि देवालयों में स्त्रियों का प्रवेश निषिद्ध है।
    • यह राजस्थान का एकमात्र शिलालेख है जिसमें ऐसा निषेध पाया गया है।

प्रसिद्ध उद्धरण और कविताएँ

राजस्थानी लोकपंक्ति:

“जठै झड़्या जयमल कल्ला, छतरी छतरां मोड़।
कमघज कट बणियाँ कमंध, गढ़ थारे चित्तौड़।।“

श्यामनारायण पाण्डेय (कविता – ‘पूजन’):

“इधर प्रयाग न गंगासागर, इधर न रामेश्वर काशी,
इधर कहाँ है तीर्थ तुम्हारा, कहाँ चले तुम सन्यासी।
मुझे न जाना गंगासागर, मुझे न रामेश्वर काशी,
तीर्थराज चित्तौड़ देखने को, मेरी आँखें प्यासी।”

पं. नरेन्द्र मिश्रा: गोरा बादल (कविता)
हेमरत्न: गोरा बादल पद्मिणी चउपई

स्रोत

  • राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति, कक्षा 10 (माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, अजमेर)
  • अकबरनामा (अबुल फज़ल)
  • वीर विनोद (श्यामलदास)
  • तारीख-ए-अलाई (अमीर खुसरो)

चित्तौड़ का किला – प्रश्न और उत्तर (20 FAQs)

प्रश्न 1. चित्तौड़ का किला कहाँ स्थित है?
उत्तर – चित्तौड़ का किला राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में स्थित है।

प्रश्न 2. चित्तौड़ किला किसने बनवाया था?
उत्तर – इसका निर्माण 7वीं शताब्दी में राजा चित्रांग मौर्य ने करवाया था।

प्रश्न 3. चित्तौड़ किले की ऊँचाई कितनी है?
उत्तर – किला एक पहाड़ी पर स्थित है जिसकी ऊँचाई लगभग 590 फीट (180 मीटर) है।

प्रश्न 4. चित्तौड़ किले का क्षेत्रफल कितना है?
उत्तर – यह लगभग 700 एकड़ में फैला हुआ है और इसका परिधि लगभग 13 किमी है।

प्रश्न 5. चित्तौड़ किले में कितने द्वार हैं?
उत्तर – इस किले में कुल 7 द्वार (पोल) हैं।

प्रश्न 6. चित्तौड़ किले के प्रसिद्ध स्थलों के नाम बताइए।
उत्तर – विजय स्तम्भ, कीर्ति स्तम्भ, पद्मिनी महल, रतन सिंह महल, मीरा मंदिर और कालिका माता मंदिर प्रमुख हैं।

प्रश्न 7. चित्तौड़ किला कब यूनेस्को विश्व धरोहर बना?
उत्तर – वर्ष 2013 में इसे यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया।

प्रश्न 8. चित्तौड़ किले का ऐतिहासिक महत्व क्या है?
उत्तर – यह किला राजस्थान की वीरता, बलिदान और गौरव का प्रतीक है।

प्रश्न 9. चित्तौड़ किले में कुल कितने साके हुए थे?
उत्तर – यहाँ तीन साके हुए थे – 1303 ई., 1535 ई. और 1568 ई. में।

प्रश्न 10. चित्तौड़ के पहले साके का कारण क्या था?
उत्तर – पहला साका 1303 ई. में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के कारण हुआ।

प्रश्न 11. रानी पद्मिनी का संबंध चित्तौड़ से कैसे था?
उत्तर – रानी पद्मिनी चित्तौड़ के राजा रतन सिंह की रानी थीं, जिनका जौहर प्रसिद्ध है।

प्रश्न 12. विजय स्तम्भ किसने बनवाया था?
उत्तर – महाराणा कुम्भा ने 1448 ई. में विजय स्तम्भ बनवाया।

प्रश्न 13. कीर्ति स्तम्भ किसकी स्मृति में बनाया गया था?
उत्तर – यह जैन तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित है और जैन व्यापारी जीजा भगवाण ने इसे बनवाया।

प्रश्न 14. चित्तौड़ किले का दूसरा साका कब हुआ था?
उत्तर – दूसरा साका 1535 ई. में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के आक्रमण के समय हुआ।

प्रश्न 15. चित्तौड़ किले का तीसरा साका किसके समय हुआ?
उत्तर – तीसरा साका 1568 ई. में अकबर के आक्रमण के समय हुआ।

प्रश्न 16. चित्तौड़ का सबसे प्रसिद्ध तालाब कौन सा है?
उत्तर – गौमुख कुंड, जो किले के भीतर स्थित एक प्रमुख जलस्रोत है।

प्रश्न 17. चित्तौड़ का नाम किसके नाम पर पड़ा?
उत्तर – कहा जाता है कि इसका नाम राजा चित्रांग के नाम पर पड़ा।

प्रश्न 18. चित्तौड़ किले में कितने मंदिर हैं?
उत्तर – यहाँ 130 से अधिक मंदिर हैं, जिनमें मीरा मंदिर और कालिका माता मंदिर प्रसिद्ध हैं।

प्रश्न 19. चित्तौड़ किला किस नदी के किनारे स्थित है?
उत्तर – यह गम्भीरी और बेड़च नदियों के संगम पर स्थित है।

प्रश्न 20. चित्तौड़ किला देखने का सबसे अच्छा समय कौन सा है?
उत्तर – अक्टूबर से मार्च के बीच का समय घूमने के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।

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