राजपूतों की उत्पत्ति | इतिहास, सिद्धान्त और निष्कर्ष

Table of Contents

राजपूतों की उत्पत्ति

हर्षवर्धन की मृत्यु और राजनीतिक स्थिति

हर्षवर्धन की मृत्यु (647 ई.) के बाद भारत की राजनीतिक एकता जो गुप्तों के समय स्थापित हुई थी, पुनः समाप्त होने लगी। उत्तर भारत में अनेक छोटे-छोटे राज्यों की स्थापना हुई। यह राज्य आपस में संघर्षरत थे। इन संघर्षों के परिणामस्वरूप जो नए राजवंश उभरे वे राजपूत राजवंश कहलाते हैं।

राजपूत काल

हर्षवर्धन की मृत्यु (647 ई.) से लेकर मोहम्मद गौरी के गुलामों द्वारा दिल्ली पर अधिकार (1206 ई.) तक के काल को ‘राजपूत काल’ (700 ई. से 1200 ई.) कहा जाता है।

‘राजपूत’ शब्द का प्रयोग

‘राजपूत शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग सातवीं शताब्दी में मिलता है जो राजपुत्र (संस्कृत) शब्द का ही विकृत रूप है। चाणक्य के अर्थशास्त्र, कालिदास एवं बाणभट्ट के नाटकों में ‘राजपुत्र’ शब्द का प्रयोग सामन्तों के अर्थ में किया गया है।

चीनी यात्री हवेनसांग ने अपनी पुस्तक ‘सी यू की’ में राजाओं को कहीं क्षत्रिय, कहीं राजपूत लिखा है। मुसलमानों के आक्रमण से पहले यहाँ के सभी शासक क्षत्रिय कहलाते थे, बाद में यहाँ के शासकों की जाति के लिए राजपूत शब्द प्रयोग किया जाने लगा।

डॉ. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा का मत

डॉ. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने राजपूतों की उत्पत्ति के विषय में लिखा है कि “राजपूत शब्द का प्रयोग नया नहीं है। प्राचीन काल के ग्रन्थों में इसका व्यापक प्रयोग मिलता है। चाणक्य के ‘अर्थशास्त्र’, कालीदास के नाटकों व बाणभट्ट के ‘हर्षचरित’ तथा कादम्बरी में इस शब्द का प्रयोग किया गया है।”

चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी जो हर्षवर्धन के समय के आया था, राजाओं को कहीं क्षत्रिय, कहीं राजपूत लिखा है।

विशेष टिप्पणी

नोट – 8वीं शताब्दी तक इस शब्द का प्रयोग जाति के लिए नहीं बल्कि शासक वर्ग के लिए अथवा कुलीन क्षत्रियों के लिए किया जाता था।

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राजपूतों की उत्पत्ति

राजपूतों की उत्पत्ति का प्रश्न अभी तक विवादास्पद बना हुआ है इसके सम्बन्ध में कई मत / सिद्धान्त मिलते हैं। जो निम्न प्रकार है-

अग्निकुण्ड से उत्पत्ति सिद्धान्त

अग्निकुण्ड से उत्पत्ति सिद्धान्त

चन्दबरदाई का उल्लेख

चन्दरबदाई ने अपने ग्रन्थ ‘पृथ्वीराज रासो’ में राजपूतों की उत्पत्ति अग्निकुंड से बताई है।
आबू पर्वत पर निवास करने वाले विश्वामित्र, गौतम, अगस्त्य व अन्य ऋषि धार्मिक अनुष्ठान करते थे, तो उसी समय दानव मांस, हड्डियाँ व मलमूत्र डालकर उनके अनुष्ठान को अपवित्र कर देते थे।

इन दैत्यों का अन्त करने के लिए वशिष्ठ मुनि ने यज्ञ से तीन यौद्धाओं (प्रतिहार, परमार, चालुक्य) को उत्पन्न किया। जब ये तीनों भी यज्ञ की रक्षा करने में असफल रहे तो वशिष्ठ ऋषि ने यज्ञ से चौथा यौद्धा उत्पन्न किया, जो प्रथम तीन से ज्यादा ताकतवर और हथियार से सुसज्जित था, जिसका नाम चाहमान (चौहान) रखा गया।

इस यौद्धा ने आशापुरा माता को अपनी कुलदेवी मानकर उसके आशीर्वाद से उन दैत्यों को मार भगाया। इस प्रकार राजपूतों का जन्म अग्निकुंड से हुआ, इसलिए यह राजपूत ‘अग्निवंशीय’ कहलाते हैं।

राजपूत शाखाओं का वर्णन

  • चन्दबरदाई ने अपने ग्रन्थ में राजपूतों की 36 शाखाओं का वर्णन किया है।
  • राजपूतों के अग्निकुण्ड से उत्पत्ति का मत सर्वप्रथम चन्दबरदाई ने ‘पृथ्वीरास रासो’ में प्रतिपादित किया।
  • मुहणौत नैणसी और सूर्यमल्ल मिश्रण ने भी अग्निकुण्ड से उत्पत्ति के मत का समर्थन किया है।

इतिहासकारों की असहमति

परन्तु अनेक इतिहासकार इस मत से असहमत हैं क्योंकि छठी से 16वीं शताब्दी के अनेक अभिलेखों और साहित्यिक ग्रन्थों से प्रमाणित होता है कि –

  • चार में से तीन (प्रतिहार, परमार, चौहान) सूर्यवंशी थे।
  • चालूक्य (सोलंकी) चन्द्रवंशी थे।

वैज्ञानिक युग में व्याख्या

यद्यपि आज के वैज्ञानिक युग में इस कथा को स्वीकार नहीं किया जा सकता, किन्तु इस कथा में अन्तर्निहित संकेतों को विद्वानों ने समझने का प्रयास किया है।

विद्वानों के अनुसार संभवतः –

  • प्राचीन काल के क्षत्रिय, जो बौद्ध बन गए थे,
  • अथवा प्राचीन आदिवासी (भील, मीणा आदि),
  • या विदेशी आक्रमणकारी शक्तियाँ (शक, हूण, यूची आदि)
    को यज्ञ (अग्नि) शुद्धि करके क्षत्रिय वर्ग में शामिल किया गया हो।

विद्वानों की राय

  • डॉ. ओझा लिखते हैं कि ‘पृथ्वीराज रासो’ का सहारा लेकर जो विद्वान इन चार राजपूत वंशों को अग्निवंशीय मानते हैं तो यह उनकी हठधर्मिता है।
  • डॉ. दशरथ शर्मा, वैद्यक एवं डॉ. ईश्वरीप्रसाद ने अग्निकुंड से उत्पत्ति के सिद्धांत की कल्पना की है।

ब्राह्मणों से उत्पत्ति सिद्धान्त

ब्राह्मणों से उत्पत्ति सिद्धान्त

डॉ. भंडारकर का मत

  • सर्वप्रथम डॉ. भंडारकर ने गुहिल राजपूतों की उत्पत्ति नागर ब्राह्मणों से बतलायी है।
  • साक्ष्य के रूप में डॉ. भंडारकर बिजौलिया शिलालेख का उल्लेख करते हैं, जिसमें वासुदेव चौहान के उत्तराधिकारी सामन्त को ‘वत्स गौत्रीय ब्राह्मण’ बताया गया है।
  • इसके अतिरिक्त उनके अनुसार राजशेखर ब्राह्मण का विवाह अवन्ती सुन्दरी के साथ होना, चौहानों की ब्राह्मण वंश से उत्पत्ति का अकाट्य प्रमाण है।
    (स्रोत – राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति, कक्षा-10, पेज-8)

विदेशी उत्पत्ति से भी संबंध

  • डॉ. भंडारकर कुछ राजपूत वंशों की विदेशी उत्पत्ति के मत का भी समर्थन करते हैं।
  • उनका मत है कि राजपूत गुर्जरों की संतान हैं, जो हूणों के साथ भारत आए और मध्य एवं पश्चिमी भारत में बस गए।

शिलालेखीय साक्ष्य

  • मण्डोर शिलालेख (जोधपुर) के अनुसार प्रतिहार राजपूत ब्राह्मण हरिशचन्द्र तथा उनकी पत्नी भद्रा की संतान थे।
  • आबू के प्रतिहारों को वशिष्ठ ऋषि की संतान कहा गया है।

अन्य ग्रंथों में उल्लेख

  • पिंगल सूत्र कृति में भी राजपूतों को ब्राह्मणों की संतान बताया गया है।
  • डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने मेवाड़ के गुहीलों को नागर जाति के ब्राह्मण गुहेदत्त का वंशज बताया है।
    (स्रोत – राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति, कक्षा-10, पेज-8)
  • गीत गोविन्द की टीका रसिक प्रिया में महाराणा कुम्भा ने यह स्वीकार किया कि गुहिलोत नागर ब्राह्मण गुहेदत्त की संतान है।

विद्वानों की असहमति

  • डॉ. ओझा, वैद्य तथा डॉ. दशरथ शर्मा ने इस ब्राह्मणवंशीय मत को अस्वीकार किया है।

विदेशियों की संतान (विदेशी उत्पत्ति सिद्धान्त)

विदेशियों की संतान

कर्नल जेम्स टॉड का मत

  • राजपूतों की विदेशी उत्पत्ति का मत सर्वप्रथम कर्नल टॉड ने प्रतिपादित किया।
  • कर्नल जेम्स टॉड ने लिखा है कि – “राजपूत शक अथवा सीथियन जाति के वंशज हैं।”
  • उन्होंने यह सिद्ध करने के लिए तर्क दिया कि राजपूतों के रीति-रिवाज (जैसे अश्व पूजा, अश्वमेध, अस्त्र पूजा व अस्त्र शिक्षा आदि) शक, सीथियन और हूणों से मिलते हैं।
  • अतः टॉड के अनुसार दोनों जातियाँ एक ही हैं।

डॉ. ओझा का खंडन

  • डॉ. ओझा ने कर्नल टॉड के इस मत का खंडन किया है।

अग्निकुण्ड की कथा से संबंध

  • कर्नल जेम्स टॉड ने अग्निकुण्ड की कहानी को स्वीकार करते हुए अपनी पुस्तक “Annals and Antiquities of Rajasthan” में लिखा है कि –
    • ये विदेशी जातियाँ लगभग छठी शताब्दी में भारत में प्रविष्ट हुईं।
    • इन्होंने यहाँ के साम्राज्यों को जीतकर शासन किया।
    • बाद में इन्हें ‘अग्नि संस्कार’ के द्वारा पवित्र कर भारत की जाति व्यवस्था के अंतर्गत क्षत्रिय वर्ण में सम्मिलित कर लिया गया।

वी. ए. स्मिथ का मत

  • वी. ए. स्मिथ ने अपनी पुस्तक “Early History of India” में लिखा है कि –
    • राजपूत जाति 8वीं या 9वीं शताब्दी में अचानक प्रकट हुई थी।
    • स्मिथ ने राजपूतों को ‘हूणों की संतान’ बताया है।

कनिंघम का मत

  • कनिंघम ने 978 ई. के ‘ब्रोचगुर्जर’ नामक ताम्रपत्र के आधार पर राजपूतों को ‘यू-ची’ जाति का वंशज माना है।
  • उन्होंने राजपूतों का संबंध कुषाण जाति से भी जोड़ा है।

सूर्यवंशी व चन्द्रवंशी सिद्धान्त

सूर्यवंशी व चन्द्रवंशी सिद्धान्त

अग्निपुराण का उल्लेख

  • अग्निपुराण के अनुसार –
    • कृष्ण व अर्जुन (चन्द्रवंशी) तथा
    • राम व लव-कुश (सूर्यवंशी)
      के वंशज ही राजपूत हैं।

डॉ. दशरथ शर्मा का मत

  • डॉ. दशरथ शर्मा ने राजपूतों को सूर्यवंशी व चन्द्रवंशी बताया है।

शिलालेखीय प्रमाण

  • हर्षनाथ शिलालेख (सीकर) में चौहानों को सूर्यवंशी बताया गया है।
  • आबू पर्वत शिलालेख (1285 ई.) में गुहिलवंशीय राजपूतों की उत्पत्ति रघुकुल से बताई गई है।

भाटों की वंशावलियाँ

वंशावली लिखने वाले भाटों ने –

  • राठौड़ों को सूर्यवंशी,
  • तथा यादवों, भाटियों और चन्द्रावती के चौहानों को चन्द्रवंशी बताया है।

हम्मीर महाकाव्य का उल्लेख

  • हम्मीर महाकाव्य (लेखक – नयनचन्द्र सूरी) ने चौहानों को सूर्यवंशी बताया है।

वैदिक आर्यों की संतान सिद्धान्त

डॉ. ओझा और सी.वी. वैद्य का मत

  • डॉ. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा तथा सी.वी. वैद्य राजपूतों को भारतीय आर्यों के क्षत्रिय वर्ण (राजन्य वर्ग) की संतान मानते हैं।
  • उनके कथनानुसार राजपूत प्राचीन क्षत्रियों की तरह –
    • अश्व और अस्त्र की पूजा करते हैं।
    • प्राचीन आर्यों की भांति यज्ञ और बलि में विश्वास रखते हैं।
  • उनके सुडोल शारीरिक गठन, लम्बी नाक और लम्बे सिर से भी यह प्रमाणित होता है कि वे आर्यों की संतान हैं।
    (स्रोत – राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति, कक्षा-10, पेज-7)

शास्त्रीय प्रमाण

  • मनुस्मृति के अनुसार राजपूतों की उत्पत्ति ब्रह्मा से बताई है।
  • ऋग्वेद के अनुसार क्षत्रिय ब्रह्मा की बांहों से उत्पन्न हुए थे।

मिश्रित मूल का सिद्धान्त (सर्वाधिक मान्य सिद्धान्त)

देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय का मत

  • देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय ने मिश्रित जातीय अवधारणा का समर्थन किया।
  • राजपूतों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में किसी एक निश्चित मत या सिद्धान्त का प्रतिपादन करना कठिन है।
  • यह संभव है कि –
    • कुछ वंशों की उत्पत्ति ब्राह्मण वंशों से हुई हो।
    • तो कुछ प्राचीन क्षत्रियों के वंशज रहे हों।

डॉ. कानूनगो का निष्कर्ष

अंत में डॉ. कानूनगो के शब्दों में इस विवाद को समाप्त किया जा सकता है –

“अग्निकुण्ड की कहानी इस युग में नहीं चल सकती, उनकी सूर्य अथवा चन्द्र से उत्पत्ति एक काल्पनिक सत्य हो सकती है। राजपूत चाहे किसी भी रूप में जन्में हों लेकिन यह सत्य है कि इतिहास में उन्होंने महाकाव्य काल के क्षत्रियों की परम्पराओं को बनाए रखा है।”

निष्कर्ष

राजपूतों की उत्पत्ति का प्रश्न इतिहासकारों और विद्वानों के बीच सदैव विवादास्पद रहा है। अलग-अलग समय पर विभिन्न सिद्धान्त प्रस्तुत किए गए हैं –

  • अग्निकुण्ड सिद्धान्त राजपूतों को पौराणिक आधार देता है।
  • ब्राह्मणों से उत्पत्ति सिद्धान्त कुछ वंशों को ब्राह्मण मूल का मानता है।
  • विदेशी उत्पत्ति सिद्धान्त उन्हें शक, हूण, कुषाण और गुर्जरों से जोड़ता है।
  • सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी सिद्धान्त उन्हें राम और कृष्ण के वंशज ठहराता है।
  • वैदिक आर्यों की संतान सिद्धान्त उन्हें प्राचीन आर्य क्षत्रियों का वंशज मानता है।
  • और अंततः, मिश्रित मूल का सिद्धान्त सबसे अधिक मान्यता प्राप्त है, जो यह मानता है कि राजपूत अनेक स्रोतों से आए – कुछ प्राचीन क्षत्रिय थे, कुछ ब्राह्मण वंशों से और कुछ विदेशी जातियों से शुद्धिकरण के बाद क्षत्रिय बनाए गए।

अतः यह निश्चित रूप से कहना कठिन है कि राजपूतों की उत्पत्ति केवल एक ही स्रोत से हुई। किन्तु इतना निर्विवाद है कि –
राजपूत चाहे किसी भी रूप में उत्पन्न हुए हों, उन्होंने मध्यकालीन भारत की राजनीति, संस्कृति और युद्धक परम्पराओं में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया और क्षत्रिय धर्म की परम्पराओं को जीवित रखा।

राजपूतों की उत्पत्ति – रिवीजन नोट्स

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • हर्षवर्धन की मृत्यु (647 ई.) के बाद भारत की राजनीतिक एकता टूट गई।
  • छोटे-छोटे राज्य बने और आपसी संघर्ष से नए राजवंश उभरे, जिन्हें राजपूत राजवंश कहा गया।
  • राजपूत काल – 700 ई. से 1200 ई.

“राजपूत” शब्द का प्रयोग

  • “राजपुत्र” (संस्कृत) से विकृत रूप।
  • 7वीं शताब्दी से प्रयोग।
  • प्रारम्भ में सामन्त / शासक वर्ग के लिए, जाति के लिए नहीं।
  • हवेनसांग ने क्षत्रिय और राजपूत दोनों शब्द प्रयोग किए।

प्रमुख सिद्धान्त

1. अग्निकुण्ड सिद्धान्त
  • पृथ्वीराज रासो (चन्दबरदाई) में वर्णन।
  • आबू पर्वत पर यज्ञ से चार वंश उत्पन्न – प्रतिहार, परमार, चालुक्य, चौहान
  • आधुनिक इतिहासकार इसे पौराणिक कथा मानते हैं।
2. ब्राह्मणों से उत्पत्ति
  • डॉ. भंडारकर का मत।
  • बिजौलिया शिलालेख व अन्य ग्रंथों में उल्लेख।
  • कुछ वंशों को नागर ब्राह्मणों से जोड़ा।
3. विदेशी उत्पत्ति
  • कर्नल टॉड : राजपूत शक/सीथियन वंशज।
  • वी.ए. स्मिथ : हूणों की संतान।
  • कनिंघम : यू-ची/कुषाण वंशज।
  • बाद में अग्नि संस्कार से क्षत्रिय बनाए गए।
4. सूर्यवंशी व चन्द्रवंशी
  • अग्निपुराण में उल्लेख।
  • चौहान सूर्यवंशी, राठौड़ सूर्यवंशी, यादव व भाटी चन्द्रवंशी।
  • कई शिलालेख और वंशावलियाँ समर्थन में।
5. वैदिक आर्यों की संतान
  • डॉ. ओझा व सी.वी. वैद्य का मत।
  • राजपूत प्राचीन क्षत्रियों की परम्पराओं को आगे बढ़ाने वाले।
  • शारीरिक गठन और रीति-रिवाज आर्यों जैसे।
6. मिश्रित मूल का सिद्धान्त (सर्वाधिक मान्य)
  • देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय का मत।
  • राजपूत विभिन्न स्रोतों (क्षत्रिय, ब्राह्मण, विदेशी) से आए।
  • यही आधुनिक इतिहासकारों के बीच सबसे मान्य मत है।
निष्कर्ष
  • राजपूतों की उत्पत्ति विवादास्पद है।
  • कोई एक निश्चित मत सर्वमान्य नहीं।
  • परंतु यह निश्चित है कि राजपूतों ने क्षत्रिय धर्म की परम्पराओं को जीवित रखा और मध्यकालीन भारत की राजनीति व संस्कृति में अहम योगदान दिया।

राजपूतों की उत्पत्ति – FAQ

Q1. राजपूत काल किसे कहा जाता है?
Answer:
हर्षवर्धन की मृत्यु (647 ई.) से लेकर मोहम्मद गौरी के गुलामों द्वारा दिल्ली पर अधिकार (1206 ई.) तक के काल को राजपूत काल कहा जाता है। इसकी समय-सीमा लगभग 700 ई. से 1200 ई. तक मानी जाती है।

Q2. “राजपूत” शब्द की उत्पत्ति कहाँ से हुई?
Answer:
“राजपूत” शब्द संस्कृत के “राजपुत्र” से निकला है। प्रारम्भ में इसका प्रयोग सामन्तों और शासक वर्ग के लिए किया जाता था, जाति के लिए नहीं।

Q3. “राजपूत” शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख कहाँ मिलता है?
Answer:
“राजपुत्र” शब्द का उल्लेख चाणक्य के अर्थशास्त्र, कालिदास के नाटकों और बाणभट्ट के ग्रंथों में मिलता है।

Q4. अग्निकुण्ड सिद्धान्त किस ग्रंथ में वर्णित है?
Answer:
अग्निकुण्ड सिद्धान्त का वर्णन चन्दबरदाई के ग्रंथ पृथ्वीराज रासो में मिलता है।

Q5. अग्निकुण्ड से उत्पन्न चार प्रमुख वंश कौन से माने जाते हैं?
Answer:
प्रतिहार, परमार, चालुक्य (सोलंकी) और चौहान।

Q6. राजपूतों की विदेशी उत्पत्ति का मत सबसे पहले किसने दिया?
Answer:
कर्नल जेम्स टॉड ने। उन्होंने राजपूतों को शक और सीथियन जातियों का वंशज बताया।

Q7. वी. ए. स्मिथ ने राजपूतों को किसकी संतान बताया?
Answer:
वी. ए. स्मिथ ने अपनी पुस्तक Early History of India में राजपूतों को हूणों की संतान बताया।

Q8. कनिंघम ने राजपूतों का संबंध किस जाति से जोड़ा?
Answer:
कनिंघम ने 978 ई. के ब्रोचगुर्जर ताम्रपत्र के आधार पर राजपूतों को यू-ची जाति का वंशज माना और उनका संबंध कुषाण जाति से जोड़ा।

Q9. चौहानों को सूर्यवंशी बताने वाला प्रमाण कौन सा है?
Answer:
हर्षनाथ शिलालेख (सीकर) और हम्मीर महाकाव्य (नयनचन्द्र सूरी) में चौहानों को सूर्यवंशी बताया गया है।

Q10. गुहिलवंशीय राजपूतों की उत्पत्ति रघुकुल से किस शिलालेख में बताई गई है?
Answer:
आबू पर्वत शिलालेख (1285 ई.) में।

Q11. भाटों की वंशावलियों में राठौड़ों को किस वंश का बताया गया है?
Answer:
राठौड़ों को सूर्यवंशी और यादवों, भाटियों तथा चन्द्रावती के चौहानों को चन्द्रवंशी बताया गया है।

Q12. डॉ. भंडारकर ने राजपूतों की उत्पत्ति किससे मानी?
Answer:
डॉ. भंडारकर ने राजपूतों की उत्पत्ति नागर ब्राह्मणों से मानी और गुहिल व चौहान वंश को ब्राह्मण वंशज बताया।

Q13. डॉ. ओझा और सी.वी. वैद्य ने राजपूतों को किसका वंशज माना?
Answer:
दोनों विद्वानों ने राजपूतों को वैदिक आर्यों (क्षत्रियों) की संतान बताया।

Q14. मिश्रित मूल का सिद्धान्त किसने प्रतिपादित किया?
Answer:
देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय ने। उन्होंने कहा कि राजपूतों की उत्पत्ति केवल एक स्रोत से नहीं हुई, बल्कि वे क्षत्रिय, ब्राह्मण और विदेशियों के मिश्रण से बने।

Q15. राजपूतों की उत्पत्ति से सम्बन्धित सबसे मान्य सिद्धान्त कौन सा है?
Answer:
मिश्रित मूल का सिद्धान्त। आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि राजपूत विभिन्न स्रोतों से उत्पन्न हुए।

राजपूतों की उत्पत्ति – MCQ

1. राजपूत काल की समय सीमा क्या है?

A. 500 ई. – 1000 ई.
B. 700 ई. – 1200 ई.
C. 600 ई. – 1100 ई.
D. 800 ई. – 1300 ई.
सही उत्तर: B. 700 ई. – 1200 ई.

2. “राजपूत” शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग कब मिलता है?

A. 5वीं शताब्दी
B. 6वीं शताब्दी
C. 7वीं शताब्दी
D. 10वीं शताब्दी
सही उत्तर: C. 7वीं शताब्दी

3. अग्निकुण्ड से उत्पन्न चार वंशों में कौन शामिल नहीं है?

A. प्रतिहार
B. परमार
C. चौहान
D. गहलोत
सही उत्तर: D. गहलोत

4. किसने राजपूतों को शक और सीथियन की संतान बताया?

A. डॉ. ओझा
B. कर्नल टॉड
C. वी. ए. स्मिथ
D. कनिंघम
सही उत्तर: B. कर्नल टॉड

5. “Early History of India” के लेखक वी. ए. स्मिथ ने राजपूतों को किसकी संतान बताया?

A. शक
B. हूण
C. यू-ची
D. नागर ब्राह्मण
सही उत्तर: B. हूण

6. किस शिलालेख में गुहिलवंशीय राजपूतों की उत्पत्ति रघुकुल से बताई गई है?

A. हर्षनाथ शिलालेख
B. मण्डोर शिलालेख
C. आबू पर्वत शिलालेख (1285 ई.)
D. ब्रोचगुर्जर ताम्रपत्र
सही उत्तर: C. आबू पर्वत शिलालेख (1285 ई.)

7. “मिश्रित जातीय अवधारणा” किस विद्वान ने प्रतिपादित की?

A. डॉ. दशरथ शर्मा
B. देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय
C. डॉ. भंडारकर
D. सी.वी. वैद्य
सही उत्तर: B. देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय

8. चौहानों को सूर्यवंशी किस ग्रंथ में बताया गया है?

A. गीत गोविन्द
B. हम्मीर महाकाव्य
C. हर्षचरित
D. कादम्बरी
सही उत्तर: B. हम्मीर महाकाव्य

राजपूतों की उत्पत्ति- Table

प्राचीन नाम व उनके क्षेत्र

क्रम संख्याप्राचीन नामक्षेत्र
1जांगल देशबीकानेर
2मत्स्य प्रदेशअलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली
3शिवि जनपदमेवाड़ का क्षेत्र
4मेवाड़उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, भीलवाड़ा
5गुहिलोतउदयपुर बस्सी से पूर्व इस स्थान का नाम
6मारवाड़जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर, पाली, नागौर
7हाड़ौतीकोटा, बूंदी, बारां, झालावाड़
8ढूंढाड़जयपुर, दौसा
9वागड़/वांगड़ प्रदेशडूँगरपुर, बांसवाड़ा
10बांगड़ (बांगर)नागौर, सीकर, झुंझुनूं, चुरू
11शेखावाटीसीकर, चुरू, झुंझुनूं
12तोरावाटी प्रदेशसीकर व झुंझुनूं (कांति नदी के प्रवाह का क्षेत्र)
13मेवात प्रदेशअलवर, भरतपुर
14राठ/अहीरवाटमुंडावर, बहरोड़, बानसूर (अलवर)
15माल खोरोमालपुरा (टोंक)
16खोरस प्रदेशजहाजपुर (भीलवाड़ा)
17मेवाड़अजमेर में टोंक के आसपास का पहाड़ी क्षेत्र
18सपाड़लक्षसवाईमाधोपुर व करौली का मध्यप्रदेश से स्पर्श करने वाला भाग
19सपाडलक्षअजमेर, नागौर, सांभर का क्षेत्र
20अनन्त प्रदेशसांभर से सीकर तक का क्षेत्र
21रूमासांभर झील के आसपास का क्षेत्र
22बरड़बूँदी जिले का पश्चिमी पथरीला क्षेत्र
23कांठलप्रतापगढ़
24मालव प्रदेशप्रतापगढ़, झालावाड़ व बाँसवाड़ा
25मेवकडूँगरपुर व बाँसवाड़ा का मध्य का भाग
26उत्तमात्रिबीजौलिया व उसके आसपास का क्षेत्र
27वृन्दावती/आहड़सिरोही व आसपास का क्षेत्र
28झाड़ावदक्षिण पूर्व बाड़मेर, जालौर व पश्चिमी सिरोही, पाली
29गुर्जरात्राजोधपुर का दक्षिणी भाग
30शूरसेनभरतपुर, धौलपुर, करौली, पूर्वी अलवर
31डांग क्षेत्रधौलपुर, करौली व सवाईमाधोपुर
32कुरु देशअलवर का उत्तरी भाग
33मालानीजैसलमेर-जालौर का क्षेत्र
34मृदुकआबू पर्वतीय प्रदेश

राजस्थान के प्रमुख राजवंश और उनकी रियासतें

क्रम संख्याराजवंशरियासतें
1गुहिलों की सिसोदिया शाखाउदयपुर, चित्तौड़गढ़, शाहपुरा, प्रतापगढ़, बाँसवाड़ा व डूँगरपुर
2चौहानसांभर, अजमेर, रणथम्भौर, नाडोल
3सोनगरा चौहानजालौर
4देवड़ा चौहानसिरोही
5हाड़ा चौहानहाड़ौती (बूँदी व कोटा)
6खींमी चौहानगागरोन

महत्वपूर्ण स्थलों के प्राचीन नाम

वर्तमान नामप्राचीन नामवर्तमान नामप्राचीन नाम
अजमेरअजयमेरुझालावाड़खींचीवाड़ा
धौलपुरकाठीमहावीर जीचांदन
करौलीगोपाललालबूँदीवृंदावती
श्रीगंगानगररामनगररामदेवरारूणचा
चित्तौड़गढ़चित्रकूटनागौरअहीच्छत्रपुर
बीकानेरजांगलभीनमालभिल्लमाल / श्रीमाल
मण्डोरमाण्डव्यपुरअनूपगढ़चूढेर
हनुमानगढ़भटनैरजयपुरढूंढाड़
बैराड़विराटनगरजयसमंददेवर
सांचौरसत्यपुरीओसियांउपकेश पत्तन
जालौरजाबालिपुरजम्वा रामगढ़मांच
सांभरसपाडलक्षसिरोहीशिवपुरी
बयानाश्रीपंथ, शोणितपुरभण्डोरजभदावती
अलवरआलोर (साल्वपुर)जावरयोगिनीपत्तन
प्रतापगढ़कांठलनगरीमध्यमिका
जोधपुरमर्कभूमिनाथद्वारासिहाड़
झालरापाटनबुजनगरआबूअर्बुद
जैसलमेरमांडडीगदीर्घवती
चाकसूचाट्स / चम्पावती

राज्यों की स्थापना

क्रम संख्याराज्यवंशसंस्थापकवर्ष
1शाकम्भरीचौहानवासुदेव551 ई.
2रणथम्भौरचौहानगोविन्दराज1194 ई.
3जालौरचौहानकीर्तिपाल1181 ई.
4नाडोलचौहानलक्ष्मण960 ई.
5सिरोहीदेवड़ा चौहानराव लुंखा1311 ई.
6बूंदीहाड़ा चौहानदेवजीसिंह1241 ई.
7कोटाहाड़ा चौहानमाधोसिंह1631 ई.
8मेवाड़गुहिलगुहिल566 ई.
9वागड़गुहिलसमरसिंह1178 ई.
10डूँगरपुरगुहिलपृथ्वीराज1527 ई.
11बाँसवाड़ागुहिलजगमाल सिंह1527 ई.
12शाहपुरागुहिलसुरजन सिंह1613 ई.
13प्रतापगढ़गुहिलप्रताप सिंह1698 ई.
14मारवाड़राठौड़राव सीढा1240 ई.
15बीकानेरराठौड़राव बीका1465 ई.
16किशनगढ़राठौड़किशन सिंह1609 ई.
17आमेरकछवाहादुलहराय1137 ई.
18अलवरकछवाहाप्रताप सिंह1774 ई.
19जैसलमेरभाटीराव जैसल1155 ई.
20करौलीयादवविजयपाल1040 ई.
21भरतपुरजाटचूड़ामन1713 ई.
22टोंकपिंडारीअमीर खाँ1817 ई.
23झालावाड़झालामदनसिंह1838 ई.

राजस्थान के प्रमुख राजवंश

क्रम संख्याराजवंशरियासतें
1गुहिलमेवाड़, डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़, शाहपुरा
2चावड़ाभीनमाल, आबू
3राठौड़जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़
4कछवाहाआमेर, जयपुर, अलवर
5यादवकरौली, जैसलमेर, हनुमानगढ़
6भाटीभटनैर (हनुमानगढ़), जैसलमेर
7परमारआबू, मालवा, जालौर, वागड़, किराड़ू
8झालाझालावाड़
9जाटभरतपुर, धौलपुर
10मुस्लिम नवाबटोंक
11गुर्जर प्रतिहारगुर्जरात्रा, मारवाड़, भीनमाल, मण्डोर

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