राजस्थान की प्रथाएं व रीति रिवाज — केसरिया, जौहर, सती, परम्पराएँ व रोक

Table of Contents

राजस्थान की प्रथाएं व रीति रिवाज

वीरता और बलिदान से जुड़ी प्रथाएँ

केसरिया-जौहर प्रथा-साका

केसरिया- राजपूत यौद्धा पराजय की स्थिति में किले के द्वार खोलकर सिर पर केसरिया साफा बांध कर शत्रु पर टूट पड़ते थे, और अपनी मातृभूमि के लिए शहीद हो जाते थे, उसे केसरिया करना कहते थे।

जौहर प्रथा- शत्रुओं के आक्रमण के समय जब राजपूत यौद्धाओं के युद्ध से जीवित लौटने की आशा नहीं रहती थी और दुर्ग दुश्मन सेना के हाथ लगने की सम्भावना होने पर, उस दशा में किले की स्त्रियों द्वारा सामूहिक रूप से अपने धर्म और आत्मसम्मान की रक्षार्थ ‘अग्निदाह’ करने की प्रथा जौहर कहलाती है। रणथम्भौर किले में 1301 ई. में जलजौहर भी हुआ था।

साका- जब राजपूत यौद्धा केसरिया करते थे और राजपूत वीरांगना जौहर व्रत करती थी, वह ‘साका’ कहलाता था।

सती प्रथा और उससे जुड़ी परम्पराएँ

सती प्रथा- महिलाओं द्वारा अपने पति की मृत्यु पर पति के शव के साथ चिता में जीवित अवस्था में अपने आप को जला लेना और मृत्यु का वरण करना सती होना कहलाता है। इसे सहमरण, सहगमन या अन्वारोहण भी कहा जाता है।

सती प्रथा- महिलाओं द्वारा अपने पति की मृत्यु पर पति के शव के साथ चिता में जीवित अवस्था में अपने आप को जला लेना और मृत्यु का वरण करना सती होना कहलाता है। इसे सहमरण, सहगमन या अन्वारोहण भी कहा जाता है।

अनुमरण- पति की कहीं अन्यत्र स्थान पर मृत्यु होने पर व वहीं उसका अंतिम संस्कार कर दिया जाने पर उसके किसी चिह्न/निशानी के साथ उसकी विधवा पत्नी द्वारा चितारोहण करना ‘अनुमरण’ कहलाता है, ऐसी सतियों को महासती भी कहा जाता है।

माँ सती- अपने मृत पुत्र के साथ सती होने वाली माताएँ माँ सती’ कहलाती है।

  • सती प्रथा पर सर्वप्रथम रोक लगाने के आदेश मुस्लिम शासक मुहम्मद तुगलक ने दिया।
  • भारत में सती होने का प्रथम प्रमाण सती होने का प्रथम साक्ष्य 510 ई. के एरण अभिलेख (सागर, M.P.) में मिलता है, इसके अनुसार हूणों के विरूद्ध युद्ध में मरने वाले सेनापति गोपराज की पत्नी सती हुई थी।
  • राजस्थान में सती होने का प्रथम प्रमाण- घटियाला शिलालेख (861 ई. जोधपुर) के अनुसार सेनापति राणूका के साथ उसकी पत्नी संपत देवी सती हुई थी।

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सती प्रथा पर रोक

  • भारत में सती प्रथा पर रोक के लिए राजाराम मोहनराय के प्रयासों से लॉर्ड विलियम बैंटिक द्वारा दिसम्बर 1829 में एक अधिनियम द्वारा सती प्रथा को दंडनीय अपराध घोषित किया गया।
  • राजस्थान में सती प्रथा पर रोक लगाने वाली प्रथम रियासत बूंदी (शासक विष्णु सिंह) थी, जिसमें 1822 ई. में सती प्रथा पर रोक लगाई गई।
  • उसके बाद 1830 ई. में अलवर में भी रोक लगाई गई।
  • मेजर जॉन लूडलों के प्रयासों से 1844 ई. में जयपुर (शासक रामसिंह) में रोक लगी।
  • इसी प्रकार 1846 ई. में डूंगरपुर, बांसवाड़ा व प्रतापगढ़ में सती प्रथा को गैर कानूनी घोषित किया गया।
  • 1848 ई. में जोधपुर व कोटा में, 1860 ई. में उदयपुर में सती प्रथा को गैरकानूनी घोषित किया गया।
  • राजस्थान में सती प्रथा का सर्वाधिक प्रचलन राजपूत जाति में था।

अंतिम सती- रूपकंवर

राजस्थान की अंतिम सती 4 सितम्बर 1987 में सीकर जिले के देवराला गाँव की रूपकवर
  • 4 सितम्बर 1987 में सीकर जिले के देवराला गाँव की रूपकवर।
  • नामक महिला सती हुई।
  • पति का नाम माल सिंह।
  • यह राजस्थान की अंतिम सती मानी जाती हैं।
  • इस घटना में 32 लोगों को गिरफ्तार किया गया था जो सीकर कोर्ट से अक्टुबर 1996 में बरी हो गये।
  • चौतरफा आलोचना के बाद राजस्थान सरकार के तत्कालीन गृहमंत्री गुलाब सिंह शक्तावत की अध्यक्षता में एक कमेटी बनी।
  • अक्टुबर 1987 में राजस्थान सरकार एक अध्यादेश लाई, तत्कालीन मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी थे।
  • अध्यादेश पर हस्ताक्षर करने वाले तत्कालीन राज्यपाल- बसंत दादा पाटील ।
  • राजस्थान में यह सती निवारण अध्यादेश (1987) 3 जनवरी। 1988 से लागू हुआ।

समाज की कुप्रथाएँ

सती प्रथा, कन्यावध, डाकनिया प्रथा, त्याग प्रथा, मानव व्यापार, दास प्रथा, समाधि प्रथा, बाल विवाह
नाम प्रथारोक का वर्षरियासतशासक/रोक लगाने वाला
सती प्रथा1822बूंदीमहाराव विष्णुसिंह
कन्यावध1833कोटामहाराव रामसिंह द्वितीय
डाकनिया प्रथा1853उदयपुरमहाराणा स्वरूप सिंह
त्याग प्रथा1841जोधपुरमहाराजा मानसिंह
मानव व्यापार1847जयपुरमेजर जॉन लूडलो
दास प्रथा1832कोटा
समाधि प्रथा1844जयपुरजॉन लूडलो/रामसिंह द्वितीय
बाल विवाह1885जोधपुरसर प्रताप

कन्यावध- इस प्रथा में राजपूत जाति में लड़की के जन्म होने पर भुखा रख कर या गला घोंट कर मार दिया जाता था।

  • राजस्थान में सर्वप्रथम कन्या वध पर रोक कोटा रियासत में महाराव रामसिंह द्वितीय के समय अंग्रेज पॉलिटिकल एजेन्ट विलकिन्सन के प्रयासों से 1833 में लगाई गई। इसके बाद बूँदी में भी 1834 में रोक लगाई गई।

डाकन प्रथा- ग्रामीण क्षेत्र में कोई बच्चा या महिला उचित उपचार के अभाव में ठीक नहीं होने पर किसी महिला पर शक किया जाता था कि उसने जादू टोने से बीमारी को बनाये रखा, इस प्रकार उस महिला को डायन / डाकन घोषित कर दिया जाता था। फिर पंचायत या महाराजा के सामने लाकर दवाब से डायन होना स्वीकार कराया जाता था।

  • इस प्रकार डायन घोषित की गई महिला को प्रताड़ित किया जाता था या मार दिया जाता था। यह प्रथा जनजाति क्षेत्रों में भीलों में सर्वाधिक प्रचलित है।
  • 1853 ई में मेवाड़ भील कोर के एक सिपाही ने डायन के शक में एक स्त्री का वध कर दिया था। इस पर अजमेर के एजीजी ने इसे समाप्त करने के लिए भारत सरकार को लिखा । तत्कालीन कमांडेट जे.सी ब्रुक की प्रेरणा से उदयपुर रियासत में महाराणा स्वरूप सिंह नें 1853 में इस प्रथा पर सर्वप्रथम रोक लगाई।
  • राजस्थान डायन प्रताड़ना निवारण अधिनियम (2015) को 26 जनवरी 2016 से लागू कर इसे गैरकानूनी घोषित कर दिया है।

डावरिया प्रथा- रियासती काल में राजा महाराजा और जागीरदार अपनी लड़की की शादी में दहेज के साथ कुछ कुंवारी कन्याएँ भी देते थे जिसे डावरी/डावरिया कहते थे। जो जनाना महलों. में सेविकाओं का जीवन व्यतीत करती थी।

नाता प्रथा- नाता एक प्रकार का पुनर्विवाह ही है, इस प्रथा में पत्नी अपने पूर्व पति को छोड़कर किसी दूसरे पुरूष को अपना पति बना लेती है यह प्रथा ग्रामीण क्षेत्रों में जनजाति लोगों में प्रचलित है।

झगड़ा- किसी स्त्री के दूसरे पति द्वारा पूर्व पति को दी जाने वाली राशि झगड़ा राशि कहलाती है।

चारी प्रथा- खैराड़ क्षेत्र (टोंक, भीलवाड़ा) में प्रचलित इस प्रथा में लड़की के परिवार वाले लड़के के घर वालों से दहेज की तरह नकद राशि लेते हैं। चारी की इस राशि के लालच में लड़की माले लड़की के वैवाहिक जीवन को ज्यादा नहीं चलने देते और फिर चारी लेकर दूसरी जगह लड़की को भेज देते हैं। कमजोर व पिछड़े वर्ग में यह प्रथा ज्यादा प्रचलित है।

कोथला- बेटी का पिता अपने रिश्तेदारों को बुलाकर बेटी व जवाई को कपड़े, आभूषण आदि थाली में रख देता है। जापे के बाद लड़की अपने ससुराल जाती है उस समय भी उसके पति व अन्य घरवालों के लिए कपड़े देने की रस्म ‘कोथला’ कहलाती है।

दापा- यह प्रथा जनजातियों में प्रचलित है। पुरूष द्वारा भगाकर लाई गई युवती के पिता को वधू मूल्य (दापा) चुका कर विवाह कर लेता है, यह प्रथा गरासियों में सर्वाधिक प्रचलित है।

त्याग प्रथा- राजपूत परिवारों में विवाह के समय चारण, भाट, ढोली आदि दृढ़तापूर्वक मुँह मांगी दान दक्षिणा की मांग करते थे, जिसे त्याग तथा इस प्रथा को त्याग प्रथा (पोल पात बारहठ) कहते हैं।

  • त्याग प्रथा को कन्या वध के लिए उत्तरदायी माना जाता है। त्याग प्रथा पर सर्वप्रथम प्रतिबंध 1841 ई. जोधपुर में महाराजा मानसिंह ने लगाया था। बाद में वाल्टर कृत राजपूत हितकारिणी सभा ने भी इस प्रथा को समाप्त करने के लिए प्रयास किया था।

दहेज प्रथा- पुत्री के विवाह पर पिता द्वारा दिया जाने वाला धन, सम्पति, नकदी आदि दहेज कहलाता है। भारत सरकार ने दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 को 1 जुलाई 1961 से लागू कर इसे गैर कानूनी घोषित कर दिया।

मानव व्यापार- महिलाओ व कन्याओं को खरीदने का कार्य मानव व्यापार कहलाता है। 19वीं सदी तक यह प्रथा आम थी। कोटा रियासत में मनुष्यों के क्रय विक्रय पर चौथान’ नामक कर भी वसूला जाता था। राजपूत समाज में अपनी पुत्री के विवाह पर दहेज के साथ देने के लिए लड़के लड़कियाँ खरीदने का प्रचलन था।

  • मानव व्यापार पर सर्वप्रथम प्रतिबंध जयपुर रियासत में 1847 ई. में जॉन लूडलो द्वारा लगाया गया।

मौताणा- जनजातियों में किसी पुरूष या महिला की अप्राकृतिक मृत्यु किसी व्यक्ति विशेष की लापरवाही से / दुर्घटना से हो जाती है तो उस आरोपी व्यक्ति से जो रूपया/धन मांगा जाता है वह ‘मौताणा’ कहलाता है। मौताणा मिलने पर ही आदिवासी लोग शव को घटनास्थल से उठाते हैं।

दास प्रथा- युद्ध के समय बंदी बनाये गये लोग/महिलाएँ, जिन्हें दास, दासी, गोला इत्यादि नाम से जाना जाता था। ऐसे दास दासियों से कई बार अमानवीय व घृणित कार्य भी करवाये जाते थे।

  • कई बार राजा द्वारा किसी दासी को उपपत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया जाता था, उसे ‘पड़दायत’ कहा जाता था।
  • यदि राजा उससे प्रसन्न होकर उसे पैरों में सोने के आभूषण पहनने की अनुमति दे देता था, तो उसे ‘पासवान कहा जाता था।
  • दास प्रथा की प्रथम जानकारी कौटिल्य की अर्थशास्त्र से मिलती है। भारत में इस पर सर्वप्रथम रोक अकबर ने लगाई थी। लॉर्ड विलियम बैंटिक ने 1832 में दास प्रथा पर रोक लगाई। राजस्थान में दास प्रथा पर सर्वप्रथम रोक कोटा रियासत में 1832 ई. में लगाई गई।

बेगार प्रथा- जिस काम के बदले मेहनताना प्राप्त न हो उसे ‘बेगार’ कहा जाता है। प्राचीन काल में राजाओं, सामंतो व जागीरदारों द्वारा आम जनता से किले निर्माण, कृषि कार्य, घरेलू कार्य व पशुपालन में सेवाएँ ली जाती थी, इसके बदले कोई मेहनताना नहीं दिया जाता था।

राजस्थान में ब्राह्मण और राजपूतों के अलावा सभी जातियों को बेगार देनी पड़ती थी।

सांगड़ी/बंधुआ मजदूर प्रथा- महाजन/पैसे वाले किसी व्यक्ति द्वारा गरीब व्यक्ति को उधार दी गई राशि के बदले या ब्याज की राशि के बदले उस व्यक्ति को अपने यहाँ घरेलू नौकर के रूप में रखा जाता था। नौकर के रूप में खेतो में काम करना ‘हाली प्रथा’ कहा जाता था व घरेलू नौकर के रूप में काम करना ‘चाकर प्रथा कहा जाता था।

  • सागड़ी निवारण अधिनियम 1961 के द्वारा भारत सरकार ने इसे गैरकानूनी घोषित कर दिया है।

समाधि प्रथा- इस प्रथा में किसी पुरूष या संत महात्मा द्वारा स्वेच्छा से मृत्यु का वरण किया जाता है, समाधि के दो प्रकार होते हैं।

  • जल समाधि – किसी जलस्रोत में बैठकर मृत्यु का वरण करना
  • भू-समाधि – जमीन में गड्डा खोदकर बैठ जाना और उसे भर देना।
  • समाधि प्रथा पर सर्वप्रथम रोक जयपुर के पॉलिटिकल एजेन्ट लूडलो के प्रयासों से 1844 ई. में जयपुर में रामसिह द्वितीय ने लगाई थी।

विवाह और परिवार से जुड़ी प्रथाएँ

बाल विवाह- किसी व्यक्ति का वयस्क होने से पहले विवाह करना बाल विवाह कहलाता है।

  • राजस्थान में सर्वाधिक बाल विवाह करने का चलन आखातीज (वैशाख शुक्ल तृतीया) को है।
  • राजस्थान में बाल विवाह पर सर्वप्रथम रोक 1885 ई. में जोधपुर के प्रधानमंत्री सर प्रताप ने लगाई थी।
  • भारत में ‘बाल विवाह प्रतिबंध अधिनियम 1929‘ 28 सितम्बर 1929 को ‘इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल ऑफ इंडिया में पारित हुआ। यह कानून 1 अप्रैल 1930 से पूरे भारत में लागू हुआ। इसमें लड़कियों की विवाह की न्यूनतम उम्र 14 साल व लड़कों के विवाह की उम्र 18 साल रखी गयी।
  • यह कानून हरविलास शारदा (अजमेर) के प्रयासों से लागू हुआ था इसलिए इसे ‘शारदा एक्ट’ के नाम से भी जाना जाता है।
  • भारत सरकार द्वारा एक नवीनतम कानून ‘बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 को 10 जनवरी 2007 में लागू किया गया है। इसके अनुसार 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की तथा 21 वर्ष से कम उम्र के लड़के का विवाह करना गैर कानूनी है।

विधवा विवाह- किसी स्त्री के विधवा होने पर उसका जीवन कष्टमय हो जाता है, प्राचीनकाल में महिलाओं को पुनर्विवाह की अनुमति नहीं थी। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर व लार्ड डलहोजी के प्रयासों से 1856 में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम बनाया गया और लार्ड कैनिंग द्वारा इसे 27 जुलाई 1856 को लागु किया गया।

  • राजस्थान में विधवा विवाह को सर्वप्रथम प्रोत्साहन जयपुर नरेश सवाई जयसिंह ने दिया। विवाह’ नामक पुस्तक लिखी है। चांदकरण शारदा ने ‘विधवा
  • भारत में सर्वप्रथम विधवा विवाह कोलकाता में 6 सितम्बर, 1856 को हुआ।

पर्दा प्रथा- मध्यकालीन युग में बाहरी आक्रांताओं की कुदृष्टि से महिलाओं को बचाने के लिए शुरू की गई। राजपूत जाति व मुस्लिम धर्म में यह प्रथा विशेष रूप से पायी जाती है। 19 वीं शताब्दी में समाज सुधारकों के विरोध व वर्तमान में बढ़ती शिक्षा के परिणामस्वरूप यह प्रथा धीरे-धीरे कम हो रही है।

धार्मिक/अनुष्ठानिक प्रथाएँ

संथारा/संल्लेखना- जैन ग्रन्थों में उल्लेखित इस प्रथा में अन्न जल त्याग कर समत्वभाव से स्वेच्छा से मोक्ष प्राप्ति के लिए देह त्याग की जाती है। चन्द्रगुप्त मौर्य ने श्रवणबेलगोला में संथारा किया था।

आन प्रथा- मेवाड़ के महाराणा के प्रति ली जाने वाली स्थायी भक्ति की शपथ ही ‘आन प्रथा’ कहलाती थी। 1863 ई. में ब्रिटिश सरकार के आदेश से इसे बंद कर दी गयी।

कुकड़ी की रस्म- सांसी जनजाति में शादी होने पर युवती को अपने चारित्रिक पवित्रता की परीक्षा देनी पड़ती है, यह रस्म कुकड़ी की रस्म कहलाती है।

रियाण- मारवाड़ में रियाण का अर्थ ‘सभा’ होता है जिसमें अफीम गालने व एक दूसरे को प्रदान करने की प्रथा है। मारवाड़ में विवाह, मृत्यु के अवसर व सामाजिक कार्यक्रमों में रियाण की परम्परा है।

गाँव बारण रसोई- वर्षा ऋतु में इन्द्र देवता को प्रसन्न करने के लिए किसान लोग गाँव के बाहर रसोई बनाकर इन्द्र देवता की पूजा करते हैं।

सोलह संस्कार – 16 संस्कारों का महत्व और विवरण

सोलह संस्कार गर्भाधान संस्कार-पुंसवन संस्कार-सीमन्तोनयन संस्कार-जातकर्म संस्कार-नामकरण संस्कार-निष्क्रमण संस्कार-अन्नप्राशन संस्कार-चूड़ाकर्म / जडूला संस्कार- कर्णवेध संस्कार-केशान्त संस्कार-वेदारम्भ संस्कार-वेदारम्भ संस्कार-उपनयन संस्कार (यज्ञोपवित/जनेऊ)- विद्यारम्भ संस्कार-

हिन्दू धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक व्यक्ति के जीवन को शुद्ध, पवित्र और अनुशासित बनाने के लिए सोलह संस्कार बताए गए हैं। ये संस्कार व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक उत्थान के प्रतीक माने जाते हैं।

1. गर्भाधान संस्कार– यह हिन्दुओं का प्रथम संस्कार है, जो बच्चे के गर्भ में आने पर किया जाता है। इसका उद्देश्य संतति उत्पन्न करने की धार्मिक व पवित्र प्रक्रिया है।

2. पुंसवन संस्कार- गर्भधारण के तीसरे या चौथे महीने में पुत्र प्राप्ति की कामना और गर्भस्थ शिशु के कल्याण हेतु किया जाता है।

3. सीमन्तोनयन संस्कार- गर्भावस्था के छठे या सातवें महीने में किया जाता है। इसका उद्देश्य गर्भवती स्त्री को अमंगलकारी शक्तियों से सुरक्षित रखना है।

4. जातकर्म संस्कार- जन्म के तुरंत बाद नवजात शिशु को घर के किसी सदस्य द्वारा घूंटी/पेय पदार्थ पिलाया जाता है। यह संस्कार शिशु के जीवन की शुभ शुरुआत का प्रतीक है।

5. नामकरण संस्कार- जन्म के 10वें या 11वें दिन पंडित मुहूर्त देखकर शिशु का नामकरण करते हैं।

6. निष्क्रमण संस्कार- जन्म के दो-तीन महीने बाद शिशु को पहली बार घर से बाहर निकाला जाता है। इस अवसर पर सूर्य व चन्द्रमा के दर्शन कराए जाते हैं। इसे जलवा पूजन या कुआं पूजन भी कहते हैं।

7. अन्नप्राशन संस्कार- जन्म के पाँचवे या छठे महीने शिशु को पहली बार अन्न (चावल/खीर) खिलाया जाता है।

8. चूड़ाकर्म / जडूला संस्कार- जब बच्चा दो या तीन वर्ष का होता है, तब पहली बार उसका मुंडन किया जाता है। यह कुल देवी-देवता के स्थान पर सम्पन्न होता है।

9. कर्णवेध संस्कार- जब बच्चा 5-6 वर्ष का होता है तब उसके कान बींधे जाते हैं। इसे स्वास्थ्य और सौंदर्य की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना गया है।

10. विद्यारम्भ संस्कार- बच्चे के 5-6 वर्ष का होने पर पहली बार उसे विद्या अध्ययन की शुरुआत कराई जाती है।

11. उपनयन संस्कार (यज्ञोपवित/जनेऊ)- इसमें बच्चे को जनेऊ धारण कराया जाता है।

  • ब्राह्मण वर्ग – 8 वर्ष
  • क्षत्रिय वर्ग – 11 वर्ष
  • वैश्य वर्ग – 12 वर्ष

12. वेदारम्भ संस्कार- इसमें बच्चे को वेदों का अध्ययन आरंभ कराया जाता है और उसे गुरु के पास शिक्षा हेतु भेजा जाता है।

13. केशान्त संस्कार- यौवन अवस्था में पहली बार मूंछ और दाढ़ी के बाल काटे जाते हैं। यह किशोरावस्था से यौवनावस्था में प्रवेश का संकेत है।

14. समावर्तन संस्कार- गुरुकुल में शिक्षा पूर्ण होने के बाद किशोर अपने घर लौटता है। यह शिक्षा पूर्ण होने का संस्कार है।

15. विवाह / पाणिग्रहण संस्कार- विवाह के समय किया जाने वाला संस्कार। इससे व्यक्ति ब्रह्मचर्य आश्रम से गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता है।

16. अंत्येष्टि संस्कार- यह अंतिम संस्कार है, जो मृत्यु के समय किया जाता है। इसमें मृतक का दाह-संस्कार और आत्मा की शांति हेतु कर्मकांड किया जाता है।

विवाह सम्बन्धी रस्में (क्रमवार सूची)

विवाह सम्बन्धी रस्में
  1. सगाई/सगपण – विवाह के लिए लड़का व लड़की को रोकने की रस्म, जिसमें रुपया व नारियल दिया जाता है।
  2. सावो – पंडित से विवाह का मुहूर्त निकलवाना।
  3. टीका – इसमें वधू पक्ष की तरफ से लड़के को वस्त्र, गहने, नकदी आदि भेंट दी जाती है।
  4. गोद भराई – इसमें वर पक्ष द्वारा वधू के लिए वस्त्र, गहने, नकदी व मिठाईयाँ दी जाती हैं।
  5. चिकनी कोथली – सगाई के बाद वर पक्ष की ओर से वधू को उपहार दिये जाते हैं।
  6. लग्न पत्रिका – शादी का दिन निश्चित कर कन्या पक्ष की ओर से वर के पिता को लग्न पत्रिका भेजी जाती है।
  7. इकताई – दर्जी द्वारा वर-वधू के शादी के जोड़े बनाने के लिए नाप लिया जाता है।
  8. रातिजगा – विवाह की पहली रात में तथा वधू के घर पर आगमन के बाद रातभर जागकर देवी देवताओं व मंगलकामनाओं के गीत गाये जाते हैं।
  9. भात न्यूतना/बतीसी न्यूतना – वर वधू की माताएँ अपने पीहर पक्ष को शादी में आने का न्यौता देने जाती हैं।
  10. भात भरना/मायरा भरना – वर वधू के ननिहाल पक्ष के लोग विवाह के दिन वस्त्र, गहने व नकदी आदि लेकर आते हैं।
  11. बान बिठाना – विवाह के 3/5/7 दिन पहले वर पक्ष व वधू पक्ष दोनों के घरों में गणेश पूजन कर वर/वधू को हल्दी लगाई जाती है।
  12. पीठी – हल्दी व बेसन का बना उबटन वर/वधू के लगाया जाता है।
  13. बंदीला/बंदौरी – वर व वधू का बान बैठाने के बाद उनके परिवारजन खाना खाने के लिए अपने घर आमंत्रित करते हैं, महिलाएँ वर/वधू को साथ लेकर गीत गाती हुई उनके घर जाती हैं।
  14. रोड़ी पूजन – वर पक्ष की महिलाएँ वर को साथ लेकर कूड़े-कचरे व थेपड़ी का पूजन करती हैं।
  15. चाक पूजन – वर वधू पक्ष की महिलाएँ कुम्हार के घर जाकर चाक का पूजन करती हैं व गीत गाती हुई कलश लेकर आती हैं।
  16. मेल/बढ़ार – विवाह के अवसर पर दिया जाने वाला भोज।
  17. कांकण डोरा – विवाह के अवसर पर वर-वधू के पैर पर बांधा जाने वाला लौहे की कड़ी, लाख, राई, नमक व कौड़ी बंधा हुआ मांगलिक डोरा।
  18. निकासी/घुड़चढ़ी – बारात रवाना होने से पहले दुल्हे को घोड़ी पर चढ़ाकर निकासी निकाली जाती है, इसमें वह निकट के किसी देव स्थान तक जाता है।
  19. सामेला/मधुपर्क – जब बारात लड़की वाले के गाँव पहुँच जाती है तो वधू पक्ष के मौजिज लोग बारात का स्वागत करने आते हैं।
  20. ढुकाव – दुल्हा घोड़ी पर चढकर बैंड बाजे के साथ दुल्हन के घर पहुँचता है।
  21. तोरण की रस्म – जब दुल्हा दुल्हन के घर के मुख्य दरवाजे पर आता है, तब वहाँ पर लगे लकड़ी के तोरण को अपनी तलवार या छड़ी से छूता है।
  22. झाला मिला की आरती – तोरण पर ही वधू की माता द्वारा दुल्हे का स्वागत, टीका और आरती की जाती है।
  23. हथलेवा – फेरों से पहले दुल्हन का हाथ दुल्हे के हाथ में दिया जाता है।
  24. गठजोड़ – एक कपड़े से दुल्हा व दुल्हन का गठजोड़ा कराया जाता है।
  25. फेरे – पंडित मंत्रोच्चार के साथ अग्नि के समक्ष दुल्हे दुल्हन के फेरे करवाता है।
  26. पगधोई – फेरों के बाद वधू के माता पिता द्वारा वर के पैर दूध से धोने की रस्म।
  27. कन्यादान – फेरों के बाद वधू के पिता द्वारा यथाशक्ति भेट उपहारों के साथ कन्या का दान।
  28. पहरावणी/रंगबरी – इसमें वधू पक्ष द्वारा बारात को यथा शक्ति उपहार राशि दी जाती है। इसे ‘जान झंवारी’ भी कहते हैं।
  29. दायजो /ऊझणो – वधू के पिता द्वारा वर पक्ष को दी जाने वाली सामग्री, गहने, बर्तन, नकदी आदि।
  30. गौना/मुकलावा – यदि किसी नाबालिग लड़की की शादी कर दी जाती है तो उसके बालिग होने पर पहली बार उपहार भेंटों सहित ससुराल भेजने की रस्म।
  31. कन्यावल – विवाह के दिन वधू के माता-पिता व भाईयों द्वारा रखा जाने वाला उपवास।
  32. बार रूकाई – विवाह के अवसर पर दुल्हे की बहनों द्वारा दरवाजे पर दुल्हे की राह रोककर लिया जाने वाला नेग।
  33. जुआ-जुई – विवाह के बाद वर-वधू द्वारा खेला जाने वाला खेल।
  34. गठजोड़े की जात – विवाह सम्पन्न होने पर दुल्हा दुल्हन द्वारा अपने कुलदेवी देवता के मंदिर या थान पर पूजा करने जाना।
  35. जुहांरी – दामाद को ससुराल पक्ष के लोगों द्वारा टीका निकाल कर दी जाने वाली नकदी, रुपया आदि भेंट।
  36. सोटा सोटी – शादी के बाद निकट के किसी देवस्थान पर जाने के दौरान वर-वधू गोल घूमते हुये नीम की डाली से खेलते हैं। वधू अपने देवर के साथ भी सोटा सोटी खेलती है।
  37. मांडा झांकना – विवाह के बाद दामाद के पहली बार ससुराल आने पर दुल्हे के हाथों चंवरी वाले स्थान की मिट्टी उठवा कर किसी निकट जलसमेत में बहा दी जाती है।

मृत्यु की रस्में (क्रमवार सूची)

मृत्यु की रस्में
  1. अर्थी – मृत व्यक्ति के शव को जिस शैया पर लेटाकर अंतिम संस्कार के लिए ले जाते हैं।
  2. बैकुंठी – कुछ स्थानों पर मृतक को बैकुण्ठी में बैठाकर श्मशान ले जाने की परंपरा।
  3. पानीवाड़ा – मृत व्यक्ति की शव यात्रा में जाने के लिए लोगों को कहा जाता है।
  4. भदर – किसी बुजुर्ग की मृत्यु पर परिवार के सदस्यों के सिर व दाढ़ी के बाल काटना।
  5. पिंडदान – जौ या बाजरे के आटे से बना पिंड मृतक के हाथ में रखना।
  6. बिखेर – अर्थी के ऊपर से उछाले जाने वाले सिक्के आदि।
  7. दंडोत – मृतक के बेटे व पौते शवयात्रा के आगे-आगे चलते हुए अर्थी को प्रणाम करते हैं।
  8. आधेंटा – घर से श्मशान जाते समय बीच में किसी चौराहे पर अर्थी के पासे बदलना।
  9. लापा/मुखाग्नि – मृतक के पुत्र/पौत्र द्वारा मुखाग्नि देना।
  10. कपाल क्रिया – अग्नि संस्कार के दौरान पुत्र द्वारा 6 नुकीले बांस से मृतक की खोपड़ी पर चोट करना।
  11. सांतरवाड़ा – अंतिम संस्कार के बाद सभी लोग मृतक के घर लौटते हैं।
  12. मोकाण – मृतक के रिश्तेदार परिजनों को सांत्वना देने आते हैं।
  13. फूल चूनना – मृत्यु के तीसरे दिन हड्डियाँ-दाँत इकट्ठा कर उन्हें पवित्र नदी/सरोवर में प्रवाहित करना।
  14. मौसर/खर्च – मृत्यु के 12वें दिन दिया जाने वाला भोज।
  15. औसर/जौसर – जीवित रहते ही कुछ व्यक्तियों द्वारा मृत्यु से पहले भोज देना।
  16. उठावना – मृतक के लिए रखी गई बैठक की समाप्ति करना (सामान्यतः 12वें दिन)।
  17. ओढ़ावणी – मृतक के रिश्तेदारों द्वारा परिजनों के लिए लाए गए वस्त्र आदि।
  18. पगड़ी दस्तूर – मृत व्यक्ति के बड़े पुत्र को रिश्तेदारों व परिजनों की उपस्थिति में पगड़ी बांधना।
  19. बरसी – किसी की मृत्यु का दिन उसकी पुण्यतिथि/बरसी कहलाता है।

अन्य परंपराएँ

  1. जात देना – बच्चे के जन्म के बाद नवजात को कुलदेवी/देवता के मंदिर या थान पर पूजा के लिए ले जाना।
  2. ल्हास – ग्रामीण क्षेत्रों में एक-दूसरे के खेतों में बिना पारिश्रमिक के सामूहिक मदद करना।
  3. नांगल – नवनिर्मित घर के गृहप्रवेश की रस्म व मोज।
  4. उजमणौ – किसी व्रत का उद्यापन करना।

नोट – मृत शरीर को राजस्थानी भाषा में “लाश” कहा जाता है।

राजस्थान की प्रथाएँ व रीति रिवाज – FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

Q1. राजस्थान की वीरता से जुड़ी प्रमुख प्रथाएँ कौन-कौन सी थीं?

उत्तर: राजस्थान की वीरता और बलिदान से जुड़ी प्रमुख प्रथाएँ थीं –

  • केसरिया → पराजय की स्थिति में राजपूत योद्धा सिर पर केसरिया साफा बाँधकर शत्रु पर टूट पड़ते और शहीद हो जाते थे।
  • जौहर प्रथा → शत्रु के किले पर अधिकार करने से पहले राजपूत स्त्रियाँ सामूहिक अग्निदाह कर लेती थीं।
  • साका → जब पुरुष केसरिया करते और स्त्रियाँ जौहर व्रत करतीं, उस सामूहिक घटना को साका कहा जाता था।
Q2. राजस्थान में सती प्रथा का प्रथम प्रमाण कहाँ से मिलता है?

उत्तर: राजस्थान में सती प्रथा का प्रथम प्रमाण 861 ई. के घटियाला शिलालेख (जोधपुर) से मिलता है, जिसमें सेनापति राणूका की पत्नी सम्पत देवी के सती होने का उल्लेख है।

Q3. भारत में सती प्रथा पर सबसे पहले किसने रोक लगाई?

उत्तर: भारत में सती प्रथा पर रोक लॉर्ड विलियम बैंटिक ने दिसम्बर 1829 में लगाई और इसे दंडनीय अपराध घोषित किया गया।

Q4. राजस्थान में सती प्रथा पर सबसे पहले कहाँ रोक लगी?

उत्तर: राजस्थान में सती प्रथा पर रोक सबसे पहले बूंदी रियासत (1822 ई.) में महाराव विष्णुसिंह ने लगाई।

Q5. राजस्थान की अंतिम सती कौन मानी जाती हैं?

उत्तर: राजस्थान की अंतिम सती रूपकंवर (देवराला, सीकर) मानी जाती हैं, जिन्होंने 4 सितम्बर 1987 को अपने पति मालसिंह के साथ सती हो गईं।

Q6. कन्या वध प्रथा क्या थी और इस पर कब रोक लगी?

उत्तर: कन्या वध प्रथा में पुत्री जन्म पर उसे भूखा रखकर या गला घोंटकर मार दिया जाता था। इस पर सबसे पहले कोटा रियासत (1833 ई., महाराव रामसिंह द्वितीय) में रोक लगाई गई।

Q7. डाकन प्रथा क्या थी और इसे कब समाप्त किया गया?

उत्तर: ग्रामीण और आदिवासी समाज में किसी बीमारी या अनहोनी का दोष महिलाओं पर डालकर उन्हें डायन/डाकन घोषित कर प्रताड़ित किया जाता था। इस प्रथा पर उदयपुर (1853, महाराणा स्वरूप सिंह) में रोक लगाई गई।

Q8. त्याग प्रथा क्या थी और इसे कहाँ रोका गया?

उत्तर: विवाह के समय चारण, भाट, ढोली आदि द्वारा ज़बरदस्ती दान-दक्षिणा माँगने की प्रथा को त्याग प्रथा कहा जाता था। इस पर जोधपुर (1841, महाराजा मानसिंह) ने रोक लगाई।

Q9. राजस्थान में मानव व्यापार पर कब रोक लगी?

उत्तर: विवाह हेतु लड़कियों-लड़कों की खरीद-फरोख्त को मानव व्यापार कहा जाता था। इस पर जयपुर रियासत (1847 ई., जॉन लूडलो) में रोक लगी।

Q10. बाल विवाह पर राजस्थान में कब रोक लगी?

उत्तर: राजस्थान में बाल विवाह पर सबसे पहले जोधपुर (1885, प्रधानमंत्री सर प्रताप) ने रोक लगाई। भारत में इसे रोकने के लिए शारदा एक्ट 1929 लाया गया।

Q11. संथारा या संल्लेखना प्रथा क्या है?

उत्तर: यह जैन धर्म से जुड़ी प्रथा है जिसमें व्यक्ति अन्न-जल त्यागकर समत्व भाव से मृत्यु का वरण करता है। इसे मोक्ष प्राप्ति का साधन माना गया।

Q12. आन प्रथा क्या थी और कब समाप्त हुई?

उत्तर: यह मेवाड़ महाराणा के प्रति स्थायी निष्ठा और भक्ति की शपथ थी। इसे 1863 ई. में ब्रिटिश सरकार ने समाप्त कर दिया।

Q13. रियाण प्रथा क्या थी?

उत्तर: मारवाड़ क्षेत्र में विवाह, मृत्यु या सामाजिक कार्यक्रमों पर अफीम गालने और सभा करने की परंपरा को रियाण कहा जाता था।

Q14. गाँव बारण रसोई किससे संबंधित है?

उत्तर: यह एक धार्मिक प्रथा थी जिसमें वर्षा ऋतु में किसान गाँव के बाहर सामूहिक रसोई बनाकर इन्द्र देवता की पूजा करते थे ताकि अच्छी वर्षा हो।

FAQs – सोलह संस्कार, विवाह सम्बन्धी रस्में और मृत्यु की रस्में

सोलह संस्कार (16 Sanskar)

Q1. हिन्दू धर्म का पहला संस्कार कौन सा है और उसका महत्व क्या है?
Answer: पहला संस्कार गर्भाधान संस्कार है। इसका महत्व संतान उत्पत्ति की धार्मिक और पवित्र प्रक्रिया को सुनिश्चित करना है।

Q2. अन्नप्राशन संस्कार कब किया जाता है और इसमें क्या होता है?
Answer: शिशु के 5–6 महीने की आयु में अन्नप्राशन संस्कार होता है। इसमें पहली बार शिशु को अन्न (खीर/चावल) खिलाया जाता है।

Q3. उपनयन (जनेऊ) संस्कार किस आयु में होता है और क्यों किया जाता है?
Answer: ब्राह्मण – 8 वर्ष, क्षत्रिय – 11 वर्ष, वैश्य – 12 वर्ष की आयु में यह संस्कार होता है। इसका उद्देश्य बालक को ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश दिलाना और शिक्षा का प्रारंभ कराना है।

Q4. वेदारम्भ संस्कार का क्या उद्देश्य है?
Answer: इसमें बच्चे को वेदों का अध्ययन आरंभ कराया जाता है और गुरु के पास शिक्षा हेतु भेजा जाता है।

Q5. अंतिम संस्कार कौन सा है और इसमें क्या किया जाता है?
Answer: अंतिम संस्कार अंत्येष्टि है। इसमें मृतक का दाह संस्कार होता है और आत्मा की शांति हेतु धार्मिक कर्मकांड किए जाते हैं।

विवाह सम्बन्धी रस्में (Marriage Rituals of Rajasthan)

Q6. राजस्थान में सगाई की रस्म को क्या कहते हैं और इसमें क्या होता है?
Answer: इसे सगाई या सगपण कहते हैं। इसमें लड़का और लड़की को रोकने की रस्म की जाती है और रुपया व नारियल दिया जाता है।

Q7. विवाह का शुभ मुहूर्त निकालने की रस्म कौन सी है?
Answer: इसे सावो कहते हैं। इसमें पंडित विवाह का शुभ मुहूर्त निकालते हैं।

Q8. कांकण डोरा क्या है और इसका महत्व क्या है?
Answer: वर-वधू के पैरों पर बाँधी जाने वाली लौहे की कड़ी, राई, नमक और कौड़ी से बनी डोरी को कांकण डोरा कहते हैं। इसका महत्व नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करना है।

Q9. भात भरना रस्म किसकी होती है और इसमें क्या होता है?
Answer: इसे मायरा भरना भी कहते हैं। यह वधू या वर के ननिहाल पक्ष की रस्म है। विवाह के दिन ननिहाल से गहने, वस्त्र और नकदी लाए जाते हैं।

Q10. ‘जान झंवारी’ किस रस्म को कहते हैं?
Answer: इसे पहरावणी या रंगबरी कहते हैं। इसमें वधू पक्ष द्वारा बारात को उपहार राशि दी जाती है।

Q11. गौना/मुकलावा रस्म क्या है?
Answer: यदि नाबालिग लड़की का विवाह कर दिया गया हो तो बालिग होने पर पहली बार उसे उपहारों सहित ससुराल भेजा जाता है। यही गौना या मुकलावा कहलाता है।

Q12. विवाह के बाद दामाद को नकदी/भेंट देने की रस्म का नाम क्या है?
Answer: इसे जुहांरी कहा जाता है। इसमें ससुराल पक्ष दामाद को टीका निकालकर नकदी और उपहार देते हैं।

मृत्यु सम्बन्धी रस्में (Death Rituals of Rajasthan)

Q13. अर्थी क्या होती है?
Answer: मृतक के शव को जिस शैया पर रखकर श्मशान ले जाया जाता है, उसे अर्थी कहते हैं।

Q14. आधेंटा रस्म क्या है और क्यों की जाती है?
Answer: श्मशान जाते समय बीच रास्ते में किसी चौराहे पर अर्थी के पासे बदले जाते हैं। इसे आधेंटा कहा जाता है। इसका उद्देश्य यात्रा को शुभ और संतुलित बनाना है।

Q15. कपाल क्रिया कैसे की जाती है और इसका महत्व क्या है?
Answer: अग्नि संस्कार के दौरान मृतक का पुत्र छह नुकीले बाँस से खोपड़ी पर चोट करता है। इसे कपाल क्रिया कहते हैं। इसका महत्व यह है कि इससे आत्मा को शरीर से मुक्ति मिलती है।

Q16. फूल चूनना रस्म कब होती है और इसमें क्या किया जाता है?
Answer: मृत्यु के तीसरे दिन दाह संस्कार स्थल से हड्डियाँ, दाँत आदि इकट्ठे कर किसी पवित्र नदी/सरोवर (हरिद्वार/पुष्कर) में विसर्जित किया जाता है।

Q17. मौसर रस्म क्या है और कब होती है?
Answer: इसे खर्च भी कहते हैं। यह मृत्यु के 12वें दिन दिया जाने वाला भोज है जिसमें परिवार, रिश्तेदार और समाजजन शामिल होते हैं।

Q18. पगड़ी दस्तूर का क्या महत्व है?
Answer: मृतक के बड़े पुत्र को रिश्तेदारों और परिजनों की उपस्थिति में पगड़ी बाँधी जाती है। इसका महत्व यह है कि वह अब परिवार का मुखिया माना जाता है।

Q19. किसी व्यक्ति की पुण्यतिथि को राजस्थान में क्या कहते हैं?
Answer: इसे बरसी कहा जाता है। इस दिन मृतक की स्मृति में धार्मिक कार्य और भोज का आयोजन होता है।

राजस्थान की प्रथाएँ व रीति रिवाज – MCQ प्रश्नोत्तर

Q1. राजस्थान में सबसे पहले सती प्रथा पर रोक किस रियासत में लगी थी?

A) जयपुर
B) बूंदी
C) जोधपुर
D) अलवर
उत्तर: B) बूंदी (1822, महाराव विष्णुसिंह)

Q2. राजस्थान की अंतिम सती मानी जाती हैं –

A) संपत देवी
B) रूपकंवर
C) पद्मिनी
D) गोरा-बादल की पत्नी
उत्तर: B) रूपकंवर (देवराला, सीकर, 1987)

Q3. कन्या वध प्रथा पर सर्वप्रथम रोक कब लगी?

A) 1822
B) 1830
C) 1833
D) 1841
उत्तर: C) 1833 (कोटा, महाराव रामसिंह द्वितीय)

Q4. डाकन प्रथा पर सबसे पहले कहाँ रोक लगी?

A) बूंदी
B) जयपुर
C) उदयपुर
D) कोटा
उत्तर: C) उदयपुर (1853, महाराणा स्वरूप सिंह)

Q5. त्याग प्रथा पर रोक किस शासक ने लगाई?

A) महाराणा स्वरूप सिंह
B) महाराजा मानसिंह
C) महाराव रामसिंह द्वितीय
D) सर प्रताप
उत्तर: B) महाराजा मानसिंह (जोधपुर, 1841)

Q6. मानव व्यापार पर सबसे पहले रोक कहाँ लगी?

A) बूंदी
B) जयपुर
C) कोटा
D) अलवर
उत्तर: B) जयपुर (1847, जॉन लूडलो)

Q7. राजस्थान में दास प्रथा पर सबसे पहले रोक कहाँ लगी?

A) जयपुर
B) कोटा
C) बूंदी
D) उदयपुर
उत्तर: B) कोटा (1832)

Q8. समाधि प्रथा पर रोक कब और कहाँ लगी?

A) 1832, कोटा
B) 1844, जयपुर
C) 1841, जोधपुर
D) 1853, उदयपुर
उत्तर: B) 1844, जयपुर (रामसिंह द्वितीय, जॉन लूडलो)

Q9. राजस्थान में बाल विवाह पर सबसे पहले रोक कब लगी?

A) 1833
B) 1847
C) 1885
D) 1929
उत्तर: C) 1885 (जोधपुर, सर प्रताप)

Q10. भारत में बाल विवाह रोकने के लिए कौन सा अधिनियम लाया गया?

A) सती निवारण अधिनियम
B) शारदा एक्ट
C) दहेज प्रतिषेध अधिनियम
D) बाल अधिकार अधिनियम
उत्तर: B) शारदा एक्ट 1929

Q11. संथारा/संल्लेखना किस धर्म से संबंधित है?

A) बौद्ध
B) हिन्दू
C) जैन
D) सिख
उत्तर: C) जैन धर्म

Q12. आन प्रथा किससे संबंधित थी?

A) स्त्रियों की परम्परा
B) विधवा विवाह
C) मेवाड़ महाराणा के प्रति निष्ठा
D) अफीम गालने की सभा
उत्तर: C) मेवाड़ महाराणा के प्रति निष्ठा

Q13. राजस्थान में रियाण का संबंध किससे है?

A) विवाह
B) मृत्यु संस्कार
C) अफीम गालने की परंपरा
D) पर्दा प्रथा
उत्तर: C) अफीम गालने की परंपरा (मारवाड़)

Q14. गाँव बारण रसोई किस देवता से जुड़ी प्रथा है?

A) शिवजी
B) इन्द्र देवता
C) विष्णुजी
D) गणेशजी
उत्तर: B) इन्द्र देवता

Q15. राजस्थान में दहेज प्रथा पर रोक कब लगी?

A) 1832
B) 1841
C) 1961
D) 1987
उत्तर: C) दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961

Q16. सांगड़ी/बंधुआ मजदूरी कब गैरकानूनी घोषित हुई?

A) 1856
B) 1860
C) 1929
D) 1961
उत्तर: D) 1961 (सागड़ी निवारण अधिनियम)

Q17. रूपकंवर किस प्रथा से संबंधित हैं?

A) जौहर
B) सती
C) संथारा
D) आन प्रथा
उत्तर: B) सती प्रथा (1987, सीकर)

Q18. “डाका” या “मौताणा” किससे संबंधित था?

A) युद्ध
B) मृत्यु पर दंड
C) विवाह
D) दहेज
उत्तर: B) मृत्यु पर आरोपी से धन वसूली

Q19. नाता प्रथा किस समाज में प्रचलित थी?

A) चारण
B) ब्राह्मण
C) जनजाति
D) मुस्लिम
उत्तर: C) जनजाति समाज

Q20. कुकड़ी की रस्म किस जनजाति से संबंधित है?

A) भील
B) सांसी
C) गरासिया
D) मीणा
उत्तर: B) सांसी जनजाति

Q21. डावरिया प्रथा किससे संबंधित थी?

A) विवाह में कन्याओं का दान
B) बेगार
C) दहेज
D) पर्दा प्रथा
उत्तर: A) विवाह में कन्याओं का दान

MCQs – सोलह संस्कार, विवाह सम्बन्धी रस्में और मृत्यु की रस्में

सोलह संस्कार MCQs

Q1. हिन्दू धर्म का पहला संस्कार कौन सा है?
A. अन्नप्राशन
B. गर्भाधान
C. उपनयन
D. नामकरण
Answer: B. गर्भाधान

Q2. अन्नप्राशन संस्कार कब किया जाता है?
A. जन्म के तुरंत बाद
B. 5-6 महीने बाद
C. 1 वर्ष बाद
D. 3 वर्ष बाद
Answer: B. 5-6 महीने बाद

Q3. उपनयन (जनेऊ) संस्कार क्षत्रिय के लिए किस आयु में होता है?
A. 8 वर्ष
B. 11 वर्ष
C. 12 वर्ष
D. 15 वर्ष
Answer: B. 11 वर्ष

Q4. अंत्येष्टि संस्कार का क्या महत्व है?
A. विवाह संस्कार का अंत
B. अंतिम संस्कार और आत्मा की शांति
C. वेद अध्ययन की शुरुआत
D. विद्यारम्भ संस्कार
Answer: B. अंतिम संस्कार और आत्मा की शांति

विवाह सम्बन्धी रस्में MCQs

Q5. राजस्थान में विवाह का मुहूर्त निकालने की रस्म क्या कहलाती है?
A. टीका
B. सावो
C. भात भरना
D. रातिजगा
Answer: B. सावो

Q6. ‘कांकण डोरा’ किस अवसर पर बाँधा जाता है?
A. जन्म के समय
B. विवाह के समय
C. मृत्यु के समय
D. उपनयन संस्कार
Answer: B. विवाह के समय

Q7. ‘भात भरना’ रस्म किससे संबंधित है?
A. ननिहाल पक्ष
B. ससुराल पक्ष
C. पंडित
D. दूल्हे की बहनें
Answer: A. ननिहाल पक्ष

Q8. ‘जान झंवारी’ किस रस्म को कहा जाता है?
A. कन्यादान
B. पहरावणी/रंगबरी
C. तोरण रस्म
D. ढुकाव
Answer: B. पहरावणी/रंगबरी

Q9. गौना/मुकलावा का क्या अर्थ है?
A. विवाह भोज
B. मृतक की बरसी
C. बालिग होने पर वधू को ससुराल भेजना
D. दामाद को भेंट देना
Answer: C. बालिग होने पर वधू को ससुराल भेजना

मृत्यु सम्बन्धी रस्में MCQs

Q10. मृतक के शव को जिस शैया पर ले जाया जाता है, उसे क्या कहते हैं?
A. कपाल क्रिया
B. अर्थी
C. आधेंटा
D. लापा
Answer: B. अर्थी

Q11. आधेंटा रस्म में क्या किया जाता है?
A. शव को मुखाग्नि दी जाती है
B. हड्डियाँ नदी में विसर्जित की जाती हैं
C. चौराहे पर अर्थी के पासे बदले जाते हैं
D. पुत्र द्वारा पगड़ी बाँधी जाती है
Answer: C. चौराहे पर अर्थी के पासे बदले जाते हैं

Q12. ‘कपाल क्रिया’ का मुख्य उद्देश्य क्या है?
A. आत्मा को शरीर से मुक्त करना
B. शव यात्रा की शुरुआत
C. भोज करना
D. हड्डियाँ एकत्रित करना
Answer: A. आत्मा को शरीर से मुक्त करना

Q13. मृत्यु के तीसरे दिन की रस्म को क्या कहते हैं?
A. मौसर
B. फूल चूनना
C. मोकाण
D. बरसी
Answer: B. फूल चूनना

Q14. पगड़ी दस्तूर का क्या महत्व है?
A. मृतक के पुत्र को परिवार का मुखिया मानना
B. भोज का आयोजन
C. अंतिम संस्कार करना
D. मृत्यु के दिन का स्मरण
Answer: A. मृतक के पुत्र को परिवार का मुखिया मानना

Q15. किसी व्यक्ति की पुण्यतिथि को राजस्थान में क्या कहा जाता है?
A. मौसर
B. बरसी
C. औसर
D. उठावना
Answer: B. बरसी

राजस्थान की प्रथाएँ व रीति रिवाज – तालिका

श्रेणीप्रथाविवरणरोक (यदि लागू)
वीरता और बलिदान से जुड़ी प्रथाएँकेसरियाराजपूत योद्धाओं द्वारा पराजय की स्थिति में आत्मबलिदान
जौहरआक्रमण की स्थिति में स्त्रियों द्वारा सामूहिक अग्निदाह
साकापुरुषों द्वारा केसरिया और स्त्रियों द्वारा जौहर का सामूहिक आयोजन
सती प्रथा और परम्पराएँसती प्रथापति की मृत्यु पर पत्नी का चिता में जीवित जलना
अनुमरणपति की अन्यत्र मृत्यु पर पत्नी का उसकी निशानी के साथ चिता में जलना
माँ सतीपुत्र की मृत्यु पर उसके साथ सती होना
समाज की कुप्रथाएँकन्या वधलड़की जन्म पर हत्याकोटा (1833)
डाकन प्रथामहिलाओं को डायन कहकर प्रताड़ित करनाउदयपुर (1853)
डावरिया प्रथाविवाह में कन्याओं का दान
नाता प्रथापति को छोड़कर पुनर्विवाह
चारी प्रथालड़की के विवाह में नकद लेना
त्याग प्रथाविवाह में दान-दक्षिणा की मांगजोधपुर (1841)
दहेज प्रथाविवाह में धन-संपत्ति देना1961 अधिनियम
मानव व्यापारलड़कियों-लड़कों की खरीद-फरोख्तजयपुर (1847)
डाका/मौताणाअप्राकृतिक मृत्यु पर धन वसूलना
दास प्रथायुद्ध बंदियों को दास बनानाकोटा (1832)
बेगार प्रथाबिना मजदूरी के काम
सांगड़ी/बंधुआ मजदूरीउधार के बदले नौकर बनाना1961 अधिनियम
समाधि प्रथाजल/भू समाधि द्वारा मृत्यु वरणजयपुर (1844)
विवाह और परिवार प्रथाएँबाल विवाहअल्पायु में विवाहजोधपुर (1885), शारदा एक्ट 1929
विधवा विवाहविधवाओं का पुनर्विवाह (1856 अधिनियम)
पर्दा प्रथामहिलाओं की सुरक्षा हेतु पर्दा
कोथलाबेटी को ससुराल भेजते समय उपहार देना
दापायुवती को भगाकर विवाह करने पर वधू मूल्य देना
धार्मिक/अनुष्ठानिक प्रथाएँसंथारा/संल्लेखनाजैन प्रथा, अन्न-जल त्यागकर मृत्यु वरण
आन प्रथामेवाड़ महाराणा के प्रति निष्ठा की शपथ1863
कुकड़ी की रस्मसांसी जनजाति की चरित्र-परीक्षण रस्म
रियाणमारवाड़ में अफीम गालने की सभा
गाँव बारण रसोईवर्षा हेतु इन्द्र देवता की पूजा

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