मारवाड़ किसान आंदोलन (1929–1948)
आंदोलन की शुरुआत
- मई 1929 में मारवाड़ हितकारिणी सभा ने बेगार, लाग-बाग एवं अन्य लगान दरों को लेकर जागीरदारों के विरुद्ध आंदोलन शुरू किया।
- जागीरदारों द्वारा वसूली जाने वाली लागतों की संख्या लगभग 123 प्रकार की थी।
किसानों की स्थिति
- मारवाड़ क्षेत्र की भूमि उपजाऊ नहीं थी।
- लागतें चुकाने के बाद किसानों के पास बहुत कम अनाज बचता था।
- किसानों के जीवनयापन पर संकट गहराता जा रहा था।
प्रमुख नेता और प्रेरणा
- आंदोलन का नेतृत्व करने वाले प्रमुख नेता :
- जयनारायण व्यास
- आनंदराज खुराणा
- भंवरलाल सर्राफ
- हेमचन्द्र छंगाणी
इन नेताओं ने किसानों की आवाज उठाई और उन्हें संघर्ष के लिए प्रेरित किया।
साहित्यिक योगदान
- मारवाड़ हितकारिणी सभा ने जयनारायण व्यास द्वारा लिखित दो लघु पुस्तिकाओं का प्रकाशन किया :
- ‘पोपाबाई की पोल’
- ‘मारवाड़ की अवस्था’
इन पुस्तिकाओं ने मारवाड़ प्रशासन की कमियों और किसानों की दयनीय स्थिति को उजागर किया।
दमन और गिरफ्तारी
- नेताओं की गतिविधियों से चिढ़कर राज्य ने जयनारायण व्यास, आनंदराज खुराणा और भंवरलाल सर्राफ को गिरफ्तार कर लिया।
- इन्हें नागौर में मुकदमा चलाकर 5 वर्ष की सजा दी गई।
- परंतु गांधी-इरविन समझौते के बाद 9 मार्च 1931 को इन्हें रिहा कर दिया गया।
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आंदोलन का प्रभाव
- जागीरी क्षेत्रों में चल रहे किसान आंदोलन का असर खालसा क्षेत्र पर भी पड़ा।
- यहाँ के किसानों ने भी ‘बिघोड़ी’ की ऊँची दरों और लाग-बाग का विरोध किया।
- इससे आंदोलन और अधिक व्यापक हो गया।
मारवाड़ राज्य लोक परिषद अधिवेशन (1931)
- दिनांक : 24–25 नवम्बर 1931
- स्थान : पुष्कर
- अध्यक्षता : चाँदकरण शारदा
- मुख्य अतिथि : कस्तूरबा गांधी
इस अधिवेशन में ‘बिघोड़ी’ और बेगार प्रथा के खिलाफ प्रस्ताव पारित किए गए।
यह अधिवेशन किसानों के हक और अधिकारों की लड़ाई को नई दिशा देने वाला साबित हुआ।
मारवाड़ किसान आंदोलन राजस्थान के किसान आंदोलनों की श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण अध्याय था।
इसने किसानों को जागीरदारों और अन्यायपूर्ण प्रथाओं के विरुद्ध संगठित होकर संघर्ष करने की प्रेरणा दी।
खालसा क्षेत्र में आंदोलन और बिघोड़ी दरों में कमी (1934)
- नागौर, बिलाड़ा, परबतसर, फलौदी, मेड़ता, डीडवाना, सांभर और जोधपुर के किसानों ने महाराजा से बिघोड़ी की रकम कम करने की माँग की।
- सरकार ने किसानों को कुछ कर सम्बन्धी रियायतें दी।
- 16 जून 1934 को बिघोड़ी की दर में कमी कर दी गई, जिससे खालसा क्षेत्र में किसान आंदोलन शांत हो गया।
आंदोलन का पुनः आरंभ (1936–1940)
- 1936 में राज्य सरकार ने 119 लागतों को समाप्त घोषित किया, लेकिन जागीरी क्षेत्रों में जागीरदार इन्हें वसूलते रहे।
- मारवाड़ राज्य लोक परिषद् ने किसानों का समर्थन करते हुए 7 सितम्बर 1939 को अवैध लागतों के विरुद्ध आंदोलन शुरू किया।
- जागीरदारों ने किसानों पर अत्याचार किए, फसलें नष्ट की और मारपीट की।
- 28 मार्च 1940 को सरकार ने मारवाड़ लोक परिषद् को अवैध घोषित कर दिया।
- लेकिन आंदोलन जारी रहा और जून 1940 में सरकार को परिषद को पुनः मान्यता देनी पड़ी।
महाराजा ने आंदोलन को कमजोर करने के लिए ठिकानों की शिकायतों को अलग-अलग सुनना शुरू किया और लाग-बाग व भूमि लगान की जाँच हेतु एक आयोग नियुक्त किया।
चण्डावल घटना (28 मार्च 1942)
- 1941–42 में जाट किसान सुधारक सभा किसानों को लागत कम करवाने हेतु जागरूक कर रही थी।
- 28 मार्च 1942 को मारवाड़ लोक परिषद् के कार्यकर्ता मांगीलाल और उनके साथियों ने ‘उत्तरदायी शासन दिवस’ मनाने के लिए चण्डावल (सोजत) में सम्मेलन बुलाया।
- जागीरदार ने इसे रोकने का प्रयास किया और ठिकाने के लठैतों एवं पुलिस ने कार्यकर्ताओं पर हमला कर दिया।
- महात्मा गांधी ने इस घटना की निंदा की।
- लेकिन राज्य सरकार ने मामले की जाँच के बजाय जयनारायण व्यास और उनके सहयोगियों को गिरफ्तार कर लिया।
इसके दबाव में सरकार ने 2 सितम्बर 1943 को किसानों की कुछ माँगें मान लीं और जागीरी क्षेत्र में भूमि बंदोबस्त कराने की घोषणा की।
डाबड़ा कांड (13 मार्च 1947, डीडवाना)
- मारवाड़ लोक परिषद् और किसान सभा ने 13 मार्च 1947 को डाबड़ा गाँव (नागौर) में किसान सम्मेलन आयोजित किया।
- मुख्य आयोजक : मथुरादास माथुर।
- अन्य प्रमुख नेता : द्वारकादास पुरोहित, छगनराज चौपासनीवाला, चुन्नीलाल शर्मा, नृसिंह कछवाहा, राधाकिशन बोहरा, किशनलाल शाह, बंशीधर पुरोहित, हरिन्द्र कुमार आदि।
घटना का क्रम
- सभा में जागीर प्रथा व लाग-बाग विरोधी नारे लगाए गए।
- जाट किसान जब समूह बनाकर जागीरदार के किले के पास पहुँचे, तो ठिकाने के सशस्त्र लोगों ने हमला कर दिया।
- इस हमले में :
- जागीरदार की ओर से महताब सिंह मारा गया।
- आंदोलनकारियों में चौधरी पन्नाराम, नन्दाराम, जग्गू जाट, चुन्नीलाल शर्मा, रामूराम (लाडनू), रूघाराम चौधरी सहित 12 किसान शहीद हुए।
इस हत्याकांड की पूरे देश में निंदा हुई और समाचार पत्रों ने इसे प्रमुखता से छापा।
मथुरादास माथुर ने कहा –
“आधी शताब्दी तक राजनीतिक जीवन में रहते हुए जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो सबसे अधिक झकझोरने वाली घटना डाबड़ा की ही लगती है।”
आंदोलन का अंत और स्वतंत्रता (1948)
- देश की आज़ादी तक यह आंदोलन चलता रहा।
- अंततः जून 1948 में जयनारायण व्यास के नेतृत्व में बने मंत्रिमंडल ने किसानों को राहत दी और उनकी माँगों को मान लिया।
मारवाड़ किसान आंदोलन ने राजस्थान के किसानों को जागीरदारी और अन्यायपूर्ण कर-प्रणालियों के विरुद्ध संगठित किया।
चण्डावल और डाबड़ा जैसी घटनाएँ इस आंदोलन की बलिदानी गाथाएँ हैं, जिन्होंने इसे इतिहास में अमर कर दिया।
Quick Revision Box
- आरंभ: मई 1929, मारवाड़ हितकारिणी सभा
- नेता: जय नारायण व्यास, आनंदराज खुराना, भँवरलाल सर्राफ, मथुरादास माथुर
- मुख्य कारण: बेगार प्रथा, 123 लागतें, बिघोड़ी की ऊँची दरें
- प्रमुख घटनाएँ:
- 1931 – पुष्कर अधिवेशन (कस्तूरबा गांधी मुख्य अतिथि)
- 1942 – चण्डावल घटना (सोजत)
- 1947 – डाबड़ा कांड (12 किसान शहीद)
- परिणाम: 1948 में किसानों को राहत, आंदोलन की सफलता
मारवाड़ किसान आंदोलन (1929–1948) Timeline Table
| वर्ष / तिथि | घटना | प्रमुख नेता / तथ्य |
|---|---|---|
| मई 1929 | मारवाड़ हितकारिणी सभा ने बेगार, लाग-बाग एवं अन्य लगान दरों के विरुद्ध आंदोलन शुरू किया | जय नारायण व्यास, आनंदराज खुराना, भँवरलाल सर्राफ |
| 1929 | व्यास द्वारा पोपाबाई की पोल व मारवाड़ की अवस्था पुस्तिकाएँ प्रकाशित | किसानों की समस्याएँ उजागर |
| 1931 (9 मार्च) | गांधी-इरविन समझौते के बाद नेताओं की रिहाई | व्यास, खुराना, सर्राफ |
| 24–25 नव. 1931 | पुष्कर अधिवेशन, अध्यक्ष – चाँदकरण शारदा, मुख्य अतिथि – कस्तूरबा गांधी | बेगार प्रथा व बिघोड़ी का विरोध |
| 16 जून 1934 | खालसा क्षेत्र में बिघोड़ी दर कम की गई | आंदोलन कुछ समय शांत |
| 1936 | राज्य सरकार ने 119 लागतें समाप्त घोषित की | लेकिन जागीरदार वसूली करते रहे |
| 7 सित. 1939 | अवैध लागतों के विरुद्ध आंदोलन पुनः आरंभ | मारवाड़ लोक परिषद् |
| 28 मार्च 1940 | सरकार ने परिषद को अवैध घोषित किया | जून 1940 में पुनः मान्यता दी |
| 28 मार्च 1942 | चण्डावल घटना (सोजत) – पुलिस व लठैतों द्वारा दमन | गांधीजी ने निंदा की |
| 2 सित. 1943 | सरकार ने भूमि बंदोबस्त की घोषणा की | किसानों की माँगें मानी गईं |
| 13 मार्च 1947 | डाबड़ा कांड (नागौर) – 12 किसान शहीद | मथुरादास माथुर, द्वारकादास पुरोहित |
| जून 1948 | जयनारायण व्यास के नेतृत्व में मंत्रिमंडल ने किसानों को राहत दी | आंदोलन समाप्त |
FAQ Section – मारवाड़ किसान आंदोलन
Q1. मारवाड़ किसान आंदोलन कब शुरू हुआ?
A. मई 1929 में मारवाड़ हितकारिणी सभा द्वारा।
Q2. इस आंदोलन के प्रमुख नेता कौन थे?
A. जय नारायण व्यास, आनंदराज खुराना, भँवरलाल सर्राफ, मथुरादास माथुर।
Q3. चण्डावल घटना कब हुई थी और इसमें क्या हुआ?
A. 28 मार्च 1942 को, किसानों पर लठैतों और पुलिस ने हमला किया, गांधीजी ने निंदा की।
Q4. डाबड़ा कांड कब हुआ और इसमें कितने किसान शहीद हुए?
A. 13 मार्च 1947 को, इसमें 12 किसान शहीद हुए।
Q5. इस आंदोलन का अंतिम परिणाम क्या रहा?
A. जून 1948 में जयनारायण व्यास के नेतृत्व में बने मंत्रिमंडल ने किसानों को राहत दी।